भजन-81

दोहा : नारायण अति कठिन है, हरि मिलन की बाट। या मार्ग तब पग धंरें, प्रथम शीश दै काट ।।

 ( तर्ज:- तेरे दरबार में गुरुदेव )

टेक:- हरि का नाम लेने से, तेरी क्या जीभ जलती हैं। करे वादे सभी भूले, समझ ले खास गलती है।।

1. नाम से पाप धोया जा, रोग और दोष खोया जा। बीज जैसो भी बोया जा, बेल वैसी ही फलती है।।

2. जगाले ज्ञान की ज्योति, अन्धेरा दिल का जो खोती । जिसे समझे बड़ी होती, उमर यह रोज ढलती है।।

 3. घलै जब काल की कि हों नाड़ी बन्द सब तेरी । चौरासी लाख की फेरी, रटे से राम टलती है।।

4. दवा यह दुख मिटाने की, टेम ना फेर थ्याने की । स्वर्ग के धाम जाने की, टिकट सन्तों से मिलती है।।

5. यह चन्द्रभान की बाणी, सुनी सन्तों से है कहानी । सच्चाई जीत है जाणी, नहीं वहां झूठ चलती है।।

दोहा:- विद्यावंत सरूप गुण, सुत दारा अर भोग नारायण हरि भक्ति बिन, ये सब ही हैं ।

भजन-82

 (तर्ज:- आज रल मिल कट्टी सारी).

टेक: ध्यान भजन में लाले हे, होज्या नैया पार तेरी।

1. नाम रटन तैं हो निस्तारा, हरे राम का ला जयकारा। _ सारा भ्रम मिटाले हे, मोह माया में सहम घिरी।।

2. राम रटो चाहे कृष्ण मुरारी, दास जनों के हों हितकारी। _ प्यारी प्रेम बढ़ाले हे, सुध लेंगे खुद आन हरि।।

3. सतगुरु की जा पहुँच शरण में, श्रद्धा कर ला नीत भजननें। मन में जोत जगाले हे, पांच ठगां तैं सहम डरी।

4. कह चन्द्रभान हो शुद्ध गात हे, सन्तों का ले पकड़ साथ हैं। बात कही अजमाले हे, मिल ज्यागी तनै टिकट फरी।  

भजन-83

( तर्ज:- लाकै फुरसत दो घड़ी )

 टेक:- रटले राधेश्याम जै मुक्ति पद को पाना है। लाले सच्चा ध्यान यह वक्त फेर नहीं आना है।।

1. काम, क्रोध, मद्य, लोभ, मोह तज, करके सच्चे चेत नै । मनसा वाचा कर्मणा से कर ले हर में हेत नै। जब चिड़िया चुगज्या खेत नै, फिर पीछे पछतान।।

2. दो दिन के रंग रास यहां के फायदा खाए खेले में सारे जाणे जो आए. ह्व इस दुनिया के मेले में। सूके पापड़ बेले में, हक ना हक दुख ठान। सै ।।

3. लख चौरासी कड़ी का फंदा फंसना है तो फंस ले नै। बहलावे की माया में धंसना है तो धंस ले नै । दो दिन खातिर बस ले नै, यह पक्का नहीं ठिकाना है।।

4. चन्दरभान शरण सनतों की मन चाहा फल पाए जा। हो ज्यागा निस्तारा पक्का सत्संग के मां आए जा। राम नाम धुन गाए जा, जै अपना पिंड छुटाना है।।

दोहा:- नारायण जप जोग तप, सब्सों प्रेम प्रवीन। प्रेम हरि को करत है, प्रेमी के आधीन।। दोहा:- सन्त जगत में सो सुखी, मैं मेरी को त्याग। नारायण गोबिन्द पद, दूढ़ राखत अनुराग।।

भजन-84

( तर्ज:- रटा करो गोबिन्द गिरधारी )

 टेक:- बाहण मेरी भज ले ने करतार, तेरा हो ज्यागा उद्धार ।

1. अनसुइया का सत्‌ देखन ने देवतों ने वचन भराए। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों पांच मास के बाल बनाए। पालने घाले न्यारे-न्यारे दे दे झोटे खूब झुलाए। हुए देव सभी लाचार, गये भक्ति आगै हार।।

2. श्याम रंग में रंगी हुई वा पक्की थी मीरां बाई। ले इकतारा जा मन्दिर में हरि कीर्ति थी गाईं। का प्याला पीगी हँस के बिल्कुल ना थी घलराई । उसने मिलगे कृष्ण मुरार, जब हो गया हर्ष अपार।।

3. द्रोपदी ने नग्न करें वा कौरू सभा सारी । पांडू थे खामोश वा दुख में घिरी बिचारी थी। कृष्ण का ले कै नाम वा रोवै अबला नारी थी। जब हुई थी सही पुकार, बढ़ी साड़ी बेशुमार।।

4. नर्बदा भी पार होगी ले कै हर का नाम है। शबरी ने लाकै ने रटना घरां बुला लिए राम है। कह चन्द्रभान मिलैगी मुक्ति भजले राधेश्याम हे। चल सन्तां के दरबार, जहां मन चाहा फल तैयार।।

दोहा:- नारायण जिनके हृदय, प्रीत लगी घनरयाम। जाति पाति कुल सों गए, रहे न काहु काम॥।  

भजन-85

 ( भर्ती तो हो ले बीरा फौज में ) टेक:- बहना मिट ज्यागा सब ताप हे सत्संग के मां जाण तैं।

।. लाले राम नाम की टेर हे, मिटज्या लाख चौरासी फेर है। हा ए मुक्ति मिलज्या आप, हे हर का कीर्तन गाण ते।।

2. दे पांच विषयों ने त्याग हे, और हरि भजन में लाग है। है ए थू जांगे सब पाप, यो हर का साबुन लाण तैं।

3. दर पै सतगुरुवां के जाय के, अपना सच्चा ध्यान जमाय कै! हां ए होज्या हिरदा साफ, सन्तां की गंग में नहाण तैं।

4. कह चन्द्रभान भज राम हे, यह सनता का पैगाम हे।. हां ए करकै हरि का जाप तू बच ज्यागी दुख ठान तै।

 दोहा : कबीर सो मुख धन्य है, जिहिं पुख निकलै राम । देही किसकी बापुरी, पवित्र हो है ग्राप ।।  

भजन-86

( तर्ज: - सादा चौकलिया )

 टेंक:- मत लालच में फंस बन्दे यह दुनिया झूठ कहानी है। आज नहीं तो कल चल दे हर चीज यहां से जानी है।।

1. यह संसार फूल सेम्भल बन सुआ मन ललचावै ना। चोंच मारते रुई निकलै भोरा फल का थ्यावै ना। जगत सरा भठियारे की तू सदा का बिस्तर लावै ना। सुपने कैसी माया पाकै भूल में धोखा खावै ना। आँख खुलै जब देखन लागै या खाली मुट्ठी पानी है।।

2. मात-पिता बन्धु सुत दारा जितने गोती नाती सैं। मरते गेलां मरैं नहीं सब जीते जी के साथी सैं। बनी बनी के सब प्यारे बिगड़ी में नहीं हिमाती सैं। मुंह में राम बगल में छुरी सब भरम भलोवा बाती सैं । लोग दिखावा मोह दीखै पर भीतर खेंचा तानी है।।

3. झूठे सुख ने सुख मानै सै लाग रही मेरा मेरी । के छाती पै धर लेज्या बता कुनसी चीज यहां तेरी । काम क्रोध मद्द लोभ मोह ने कस कै घाल देई घेरी। गढ़ कोठां की नीम पड़ी रहै धन माया की सब ढेरी। पांचों तन्त बिगड़जां एक दिन खा जा मौत निमानी है।।

4. कस्तूरी के मृग ज्यों डोलै बनकै किस्मत माड़ी के न घोड़ा विद्या फेरे बिन कहैं पान सड़े पनवाड़ी का। चलो चली का मेला है तज झूठा मोह फुलवाड़ी का। कह चन्द्रभान प्रलय हो पल में कर कुछ ख्याल अगाड़ी का। सनतों की किश्ती में बैठ जै अपनी ज्यान बचानी है।।

 दोहा:- निर्बल को नहीं सताइये, जाकी मोटी हाय । मुई खाल की फूंक सै, सार भसम हो जाय।।

भजन-87

( तर्ज:- मेरे नटवर नन्द किशोर )

 टेक:- हो जांगे सिद्ध काम राम के रटने तैं।

1. हरि भजन बिन नहीं गुजारा, नाम लेन तैं हो निस्तारा। मिल ज्यागा सुख धाम, राम के रटने तैं।।

2. हरि नाम से संकट टलता, शुद्ध काया हो आनन्द मिलता। मिटजां ताप तमाथ, राम के रटने तैं।।

3. काम क्रोध मदद नहीं सतावैं, मोह लोभ ना धोरे आबें। सबकै लगे लगाम, राम के रटने तैं।।

4. सन्त समागम राम सुमरले, मिट जांगे तेरे घा भीतरले। हो ज्यागा आराम, राम के रटने तैं।।

5. चन्द्रभान सन्त की माया, टोहया जिसने हर है पाया। दर्शन दें घनश्याम, राम के रटने तैं।।

दोहा: मोह महा दुख रूप है, ताको मार निकार। प्रीत जगत की छोड़ दे, तब होवै निस्तार।।

भजन-88

( तर्ज:- सादा )

 टेंकः- हरे राम कह हरे राम कह राम राभ कह हरे हरे।

1. सत्संग की इस बाणी तैं सब धू जां बन्दे पाप तेरे ।। सुबह शाम जै एक बार भी राम नाम गुण गाया जा। मन का मैल मिटै सारा तेरी हो बन्दे शुद्ध काया जा। ले कै नाम श्री सतगुरु का सच्चा ध्यान जमाया जा। लाके फुरसत आध घड़ी जै सत्संग के मां आया जा। राम भजनियां हारे कोन्या हर ने परले पार करे।।

2. पांच ततों का बना पुतला जीव बुलबुला है जल का। बादल कैसी छाया माया नहीं भरोसा है पल का। पाप की गठड़ी धरी शीश पै कुछ तो कर बोझा हल्का । राम नाम रटना लादे छोड़ भरम का सब खलका। अन्त समय का साथी हो सै रह जांगे सब माल धरे।।

3. मन का मनियां सांस डोर चुपचाप रटन की हो माला। दसों इन्द्र बस में करके पक्का बांध लिये पाला। हरि ओम रस पीवन का जै सहज-सहज पड़ज्या ढाला। सीधा जा बैकुण्ठ धाम ने कोए नहीं रोकन आला। सच्ची टला मस लगावन आले लाख चौरासी नहीं घिरे ।।

4. नर तन मुश्किल पाया बन्दे मिलता जो नहीं । काया है बेकार तेरी जब नाम रटा करतार नहीं। सच्चा सौदा कर आगे का यो नकली व्यापार नहीं। चन्द्रभान इस नाम बिना तेरा होगा कती उद्धार नहीं। वक्त चूक के पछताना हो सुन सनतों के वचन खरे।।

दोहा:- चिन्ता तो हरि नाम की, और न चितवै दास। जो कुछ चितवै नाम बिन, सोई काल की फांस।।

दोहा:- रे मन क्यों भटकत फिरत, भज श्री नन्द कुमार। नारायण अब हूं समझ, भयो न कुछ बिगार।।

भजन-89

 ( तर्ज:- दर पै सनतां के जाके )

टेक:- सत्संग के मां चल कै बहना तेरे संकट मिट जां सारे। हे ला ध्यान हरि में नहीं राम भजनियां हारे॥।

1. सत्संग का प्रकाश निराला, जहां दीप ज्ञान का चसता। दोनूं वक्तां आसन लाकै, है लूटो सौदा सस्ता। सत्संग पार होन का रस्ता, ये सन्त मुनि समझारे।।

2. कलियुग में सत्संग का लटका, हे मुक्ति सार बताया। रोग दोष का होवे खात्मा, या शुद्ध हो जाती काया। आकै हर ने कष्ट मिटाया, है जिसने रूके मारे।।

3. सत्संग की एक आध घड़ी में, तेरी कटज्या जीता | सन्तां की शरणागत जाके, तेरी चौंध टूट ज्या सारी । भ्रजले ने गोबिन्द मुरारी, हों दास हरि के प्यारे ॥

4. चन्द्रभान के फायदा बहना, हे हक ना हक दुःख पाकै। फंद कटजां आनन्दी छाज्या, हे सतगुरु धॉरे जाके । भजन कीर्तन हर के गाकै, हे लाखों पापी तारे ।।

दोहा:- तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार। राग न रोष न दोष दुःख, दास भए भव पार।।

भजन-90

( तर्ज:- तुम किसी भूल में सोई है )

 टेक:- हरि कीर्तन गाके हे, हे तनै मिलै मोक्ष की राही।

।. धरले ध्यान ख्याल हो अच्छा, यो फल कोन्या पावै कच्चा । सच्चा ध्यान जमाकै हे, हे वा तिरगी मीरांबाई।

2. संकट मिट हो आत्मा प्रसन्न, खुद गिरधारी देंगे दर्शन। कृष्ण का डां ठाकै है, हे द्रोपदी ने लाज बचाईं।।

3. हरि गंग में लाले गोता, राम नाम से मन शुद्ध होता। तोता सही पढ़ाकै हे, हे वा गनका पार लंघाईं।।

4. बिना भजन रहै कालर कोरै, बंध ले ने सन्तां के डॉरै। सतगुरु धोरे जाके है, हे तेरी होज्या सफल कमाईँ।।

5. चन्द्रभान सन्त का कहना, राम भजन दे देगा लहना। बहना प्रेम दिखा कै हे, हे हो ज्यागी तुरत सुनाईं।