भजन-191
(तर्ज:- हां ए जै राम भजन पै डटज्या )
टेक : हां ए जै चाहबे पार उतरना, ले ले सतगुरू की शरना
1. तीनों ताप मिटावें तन के, पांचों चोर भगावै मन के हां ए फिर नहीं तै से डरना, ले ले...
2. पार ब्रह्म का भेद बताते, भगवन से हैं गुरु मिलाते। हां ए करें साफ-साफ यह निरना, ले ले...
3. गुरु बिना ना गति हो तेरी, जन्म-मरण की छुटै ना फेरी। हां ए बिन समझें हो दुख भरना, ले ले...
4. अन्त समय के रक्षक होवें, रोग दोष ने जड़ तैं खोबैं। हां ए कहैं ध्यान हरि में धरना, ले ले...
5. चन्द्रभान सन्तों की बाणी, मुक्ति मेवा जै हो खानी। हां ए रख श्रद्धा सेवा करना, ले ले
भजन-192
( तर्ज:- सादा )
टेक:- हरि ओम का स्मरण कर हो शुद्ध आत्मा तेरी। जन्म-मरण का फंद कटैगा मिटै चौरासी फेरी।।
1. करोड़ों बन्ध छूट के बन्दे नर तन है पाया। राम नाम बिन सूनी है तेरी कंचन सी काया। हरि भजन का वायदा करा था इस जग में आया। आकै बात भूलग्या सारी ना बिल्कुल शर्माया। मोह माया में फंस के छयागी, आँखां बीच अन्धेरी ।।
2. सहम विषयों के चक्कर में फंस वृथा जिंदगी खोबै। यो मन बहलावा दुखी करे क्यूं राह में कांटे बोवै। एक दिन होगा पछताना इब भूल बीच में सोबै । राम नाम का साबन ला तेरे दाग जिगर के धोवै। तूही-तूही की रटना ला सब तज दे हेरा फेरी।।
3. चिड़िया रैन बसेरा है यहां दो दिन दर्शन मेला। खेल बिगाड़ काल बली आ उड़ज्या हंस अकेला। कुटुम्ब कबीला महल हवेली साथ चलै ना धेला। दो गज कपड़ा मिलै अन्त में वो भी पतला सेला। एक मिनट में होज्या तन दो मुट्ठी राख की ढेरी।।
4. चंद्र्भान सन्त का कहना जिसनै हरि पुकारा। जात-पात का भेद नहीं है दास जनों का प्यारा। हरि भजै सो हर का होई करता नहीं किनारा। भजन कीर्तन सत्संग से है हो जाता निस्तारा। भगतां के वश भगवन हों ला रटना शाम सवेरी।।
दोहा : सत्संग से वैराग होत, ताते मन सन्तोष। सन्तोष ही तो ज्ञान है, होत ज्ञान तैं मोक्ष ।।
भजन-193
( तर्ज:- राम कहूं या घनश्याम )
टेक : रट राम नाम, सिद्ध हो जां काम, वो टेंरै सुनै करतार तेरा हो ज्या बेड़ा पार।।
1. आके कष्ट सिटाया पल में जिसने हर का ध्यान भर थ खम्ब चीर प्रहलाद उभारा ध्रुव भक्त का कष्ट हरा। अजामेल को मुक्ति दे दी सदन कसाई पार करा। नरसी का गडवाला बनके सरसागढ़ में भात भरा। ला धन के ढेर, ना करी देर, न्यूं कहता है संसार, खड़े सब देखें थे नर नार॥
2. दुर्योधन की मेवा त्यागी साग विदुर घर था खाया। कबीर भक्त की यज्ञ रचा दी खुद भंडारी बन आया। सुदामा की कंगाली मेटी सौंप देई सब धन माया। नामदेव के मटके ढोए भक्त हेत दुखड़ा ठाया। सब कष्ट मिटा, दिया गिरह हटा, जब गजकी सुनी पुकार, हरि ने कुछ ना लाई वार॥
3. सुआ पढ़ाती गनका तारी, तारी मीरांबाई थी। अहिल्या का उद्धार करा रुकमण की लाज बचाई थी। झूठे बेर भिलनी के खाए बण में श्यान दिखाई थी। नर्वदा, अनसुइया और द्रोपदी की करी सहाई थी। कुब्जा प्यारी, दी काट बीमारी, हरि बने दातार, करा सब भक्तों का उद्धार॥
4. रविदास कै गंग बहा करे ठाठ जाट के घर आकै। आप बने हर नन्दा नाई सैन की बाबत दुख ठाकै। चन्द्रभान सन्त का कहना देख लियो चाहे अजमाकै । भगवान भक्त के वश में हों से भेद बतावें समझाकै। यह है युक्ति, मिलज्या मुक्ति, भज गोबिन्द कृष्ण मुरार॥ यही है संतो का प्रचार
दोहा - तन को जोगी सब करैं, मन को बिरला कोय। सहजै सब विधि पाइये, जै मन जोगी होय।।
भजन-194
टेक:- जितनी नीत हराम में जै इतनी हर में लावै। चाला जा बैकुण्ठ धाम नै दर्श हरि के पावै।।
।. बचपन खेल-कूद में खोया खास तेरी नादानी। ऐल फैल में सैल करी जब चढ़गी मस्त जवानी । सुत दारा ने देख भूल ना बात किसे की मानी । बदमाशों का साथ पकड़ डूबन की खास निशानी । मन के लाडू फोड़-फोड़ नित राजी होकै खावै।।
2. आया बुढ़ापा रंग बदल कै ढंग बिगड़ग्या तेरा। मुंह में दांत ना आंत पेट में फीका पड़ग्या चेहरा। कफ पित वायु जोर पकड़गे आन रोग ने घेरा। सांस फूल के आवै फेर भी राम नाम ना टेरा। आप भरै कौली कुनबे की कुनबा तोड़ बगावै।।
3. ऊंच नीच का भेद तजा सदा बात करी बेढ़ंगी । धर्म कर्म तै नीत हटाली कार करी ना चंगी। एक दिन काल बली आवै हो सब क्यां है की तंगी। अन्त समय में धोरा धरजां जितने साथी संगी। मरते गेलां मरे नहीं तू अकेला यमपुर जावे ।।
4. चन्द्रभान सन्त का कहना जै चाहवै सुख सी । सुबह शाम दो घड़ी टिका मन ध्यान भजन में लाना। सत्संग में जा आसन लाकै हरि कीर्तन गाना। बहतरणी तै पार होवै और मिलज्या सही ठिकाना । किसे किस्म का खटका ना जब सतगुरु भेद बतावै।।
दोहा: - सकल शिरोमणी नाम है, सब धरमन के मांहि। अनन्य भक्त वह जानिये, सुमरिन भूले नाहि।।
भजन-195
( तर्ज:- दाग जिगर के धोवे )
टेक:- बहना राम सुमरले, हो मुक्ति तेरी।
1. दसों इन्द्री करले वश में, आनन्द होज्या तेरी नस-नस में। रस में घूंट सी भरले, हो मुक्ति तेरी।
2. बात कहूं सूं तनै साच हे, बिल्कुल लागै नहीं आंच हे। पांच को काबू करले, हो मुक्ति तेरी।
3. छोड़ दे जग के झूठे झंझट, हरि 3४ और राधेश्याम रट। पट खुलजां भीतरले, हो मुक्ति तेरी।
4. फंदा काटै दुख में घिरी का, बने खिबेया नाव तेरी का। ध्यान हरि का धरले, हो मुक्ति तेरी।
5. चन्द्रभान सन्त का नारा, हरि भजन से हो निस्तारा सारा कारज सरले, हो मुक्ति तेरी।
दोहा : भक्ति करै तो ऐसी करै, जान सके ना कौय। जैसे महेंदी पात में, रंग रही दबकोय।।
भजन-196
( तर्ज:- सन्त मिलन और हरि भजन )
टेकः- सन्तों के सत्संग में जाके ले लूट हरि का लटका। हे तेरी मुक्ति होज्या नहीं किसे किस्म का अटका।।
1. काम क्रोध मद्द लोभ मोह के, मत भूल के फंद में फहना। आशा तृष्णा माया तज कै, ले राम नाम का गहना। दूर विषयों से बिल्कुल रहना, सब काम छोड़ अट पटका।।
2. राम नाम सरजीवन बूटी, पी क्यूं ना आनन्द लूटै। पांच तत्व से घिरी प्राणी, आ काल अचानक छूटै। ठेस लागते एक दम फूटै, या काया काचा मटका।।
3. हरि भजै सो हर का होई, ले राख अकीदा दिल में। टोहया जिसने पाया बहना, क्यूं फंस रही से हलचल में। कष्ट मिटा दे आकैे पल में, हे करकै एकदम झटका।।
4. चन्द्रभान सन्त का कहना, लिए देख हरि फल खाकै। राम कहें सुखधाम मिलैगा, जै बैठो ध्यान लगाकै । सतगुरु की शरणागत जाके, तेरा मिट॒ज्या सारा खटका
भजन-197
( तर्ज:- तुम किसी भूल में सोई हे )
टेक:- हरि नाम सुखदाई हे, हे ला ध्यान मगन हो रट्टा।
1. हरि कीर्तन निशिदिन करगी, कृष्ण कहै कै नाम । वा तिरगी मीरां बाई हे, हे ना हरि भजन में बट्ठा।
2. भिलनी रह थी लीन भजन में, राम नाम की रटना मन में। बण में आ रघुराई हे, हे लिखा परम गति का पढट्टा।
3. मोह माया दे छोड़ जगत की, रक्षा करते हरि भक्त की। अगत की खास कमाई हे, हे कर हिम्मत भर ले कट्ठा।
4. राम नाम जै बस जा मुख में, भोगै जिंदगी आनन्द सुख में। दुख में होवै सहाई हे, हे मिटै तीन ताप का घट्ठा।
5. चन्द्रभान सन्त मन खिलज्या, आवागमन का चक्कर टलज्या। मिलज्या कृष्ण कन्हाई हे, हे तूं मतना समझै ठट्ठा।
भजन-198
( तर्ज:- भाई जो गुरु वचन पै डटगे )
टेक:- हां रै ला राम नाम की चास आस तेरी पूरी हो सारी।
1. नानक दुखिया सब संसारा, सुखिया सो जो नाम आधारा। हरि भजनियां हर ने प्यारा, सन्त होवे चाहे घरबारी।
2. उठत बैठत सोवत नाम हो, चलते फिरते सीता राम हो राम नाम से सिद्ध काम हो, तुलसी की बाणी प्यारी ।
3. नाम से शुद्ध होज्या नर चोला, कटज्या जन्म मरण का फोला। राम नाम धन है अनमोला, ठाढ़ी भरजा अलमारी ।
4. करकै मेर जो पास बुलावै, नहीं देर बह दर्श दिखाबै। आके पल में कष्ट मिटावै, दीनों का वह हितकारी।
5. चन्द्रभान सन्त बतलावें, रोग दोष संकट मिट जानैं। पांच चोर ना धोरे आवें, नाम रटे जो गिरधारी।
भजन-199
( तर्ज:- मैं सन्त नाम का मस्ताना )
टेक:- है हरि नाम से प्यार मेरा, यही जीवन का आधार मेरा।
।. मेरा नहीं दूसरा कोई है, गिरधर ही सगा और सोई है। सब कुटुम्ब वही परिवार मेरा, यही जीवन...
2. मनै गोबिन्द अपना मोल लिया, और सही बजाके ढोल लिया। है साथी सरे बाजार मेरा, यही जीवन...
3. मने सच्चा ध्यान जमा लीन्हा, अंग-अंग में श्यर्म रमी लीनहां। है यही हार सिंगार मेरा, यही जीवन...
4. चाहे दुनिया कहो मुझे दिवानी, मैं प्रेम में होगी मस्तानी । अब हो लिया सही विचार मेरा, यही जीवन
5. में सनतों की बनगी दासी, कह चंद्र्भान कट ज्या फांसी 'एक नया बसा संसार मेरा; यही जीवन...
भजन-200
( तर्ज:- हां ए बिन समझे धोखा )
टेक : हां ए जै सनतां का संग करले, तो पट खुल जां भीतर ले।
1. बन सनतां के चरण की चेरी, फुरसत ला जा शाम सवेरी हां एतू काढ़ पांच का डर ले, तो पट...
2. सन्तां का संग हो सुखदाई, कष्ट मिटै ना रहै निवाई। हां ए तेरे तीन ताप ने हर ले, तो पट...
3. मुक्ति का मार्ग बतलावैं, माया ये अनमोल लुटावैं। हां ए कर हिम्मत न्यौली भर ले, तो पट...
4. चन्द्रभान सन्त फरमाते, जन्म-मरण के फंद कट जाते। हां एजै ध्यान हरि का धर ले, तो पट...
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