दोहा: - सुरत करो मेरे साइयाँ, हम हैं भव जल मांहि। आप ही बह जायेंगे, जो नहीं पकड़ोगे बांह।
भजन-151
( तर्ज:- पाप से धरती लरजी )
टेक:- ले राम भजन की माला जो ध्यान हरि का धरगे। हर बनगे नाव खिवैया सब परले पार उतरगे।।
।. बांल श्रुव आ आप सम्भाले, प्रहलाद भगत के संकट टाले। बन नरसी के गडवाले, खुद भात आन कै भरगे।।
2. गीद्ध जटायु पार उतारे, सुदामा को दिये महल चुबारे। अर्जुन के बन प्यारे, सब बिगड़े काम समरगे।।
3. गिरह के मुंह से गज बचाये, कबीर की यज्ञ रचाने आए। है भिन्न-भिन्न रूप बनाएं, सब देख कै पापी डरगे।
4. चन्द्रभान सन्तों ने बताई, भिलनी, लक पार लंघ तारी मीरांबाई, सब मनसा पूरी करगे। हर बनगे नाव खिवैया...
दोहा: - कबीर दर्शन सन्त के, बड़े भाग दर्शाय । जै होवे सूली सजा, कांटे ही टरि जाय ।।
भजन-152
( तर्ज:- हां ए कर ख्याल अगत का )
टेक:- हां ए हर भजले शाम सवेरी, मिटै जन्म-जन्म की फेरी।
1. ध्यान लगा कै हरि ने रटज्या, बहना सभी बीमारी कटज्या। हां ए हो शुद्ध आत्मा तेरी, मिटै जन्म-जन्म की फेरी।
2. मद्य में गाफिल हो मत भूलै, दो दिन सहम नशे में टूलै। हां ए यो तन माटी की ढेरी, मिटे जन्म-जन्म की फेरी।
3. पक्का जोड़ लगाले मन में, दूनी लगे भभाकी तन में। हां ए जा जितनी आग कसेरी, मिटै जन्म-जन्म की फेरी।
4. लादे रटना सही कती हे, मिल ज्यागी तने परम गति हे। हां ए बनज्या सतगुरु की चेरी, मिटे जन्म-जन्म की फेरी।
5. चन्द्रभान सनतों का कहना, पांच ठगों से बचिए बहना। हां ए माया फिरै लुटेरी, मिटै जन्म-जन्म की फेरी।
भजन-153
( तर्ज: - तेरे दरबार में गुरुदेव )
टेक : तेरे चरणों में ए गुरूदेव यह चिनती एक हूं ल्याई। करो कुछ मेहर दासी पै तुम्हारी शरण में आईं।।
1. विषयों की आग है मन में, मिटा दो कर दया छन मैं। जोख लगी पांच हैं तन में, ये कायां चूंट हैं खाई ।।
2. राम का नाम गाने की, सुरग के धाम जाने की । हरि के दर्श पाने की, है युक्ति तुमने समझाई ।।
3. विपत के फंद कट जाते, है मन के दोष हट जाते । ये तन के रोग मिट जाते, दवा इस दर पै वो पाई ।।
4. यह चन्द्रभान बतलावें, शरण जो सन्त की आवँ । हैं तीनो ताप मिट जावें, दिलों में शान्ति छाई ।।
दोहा:- सत् नाम हृदय बसे, लीजे जन्म सुधार । जा पल दर्शन सन्त का, ता पल की बलिहार।।
भजन – 154
( तर्ज:- तुम किसी भूल में सोई है )
टेक:- हो ज्याया कल्याण तेरा, हां ए ला सुरती हरि भजन में ।
1. नाम से शद्ध काया हो जाती, अन्त समय का सही हिमाती । साथी हो भगवान तेरा, हां ए ले राख यकीदा मन में ।
2. लूटै ने यो सौटा सस्ता, आध घड़ी में भर ले बस्ता। रस्ता हो आसान तेरा, हां ए कर ख्याल श्रीकृष्ण में।
3. बहना पांच ठगों से बचज्या, नस-नस में हरि नम हि रच ज्या जचज्या जै सही ध्यान तेरा, हां ए नई जोत जागज्या तन में ।
4. काल से एक दिन घीटी घुटज्या, जोड़ी जाड़ी माया लूट ज्या। छुटज्या महल मकान तेरा, हां ए क्यूं दे रही जान विघ्न मै।
5. चन्द्रभान ये सन्त बतागे, बहना तेरे कर्म हैं जागे। हो आगे का सामान तेरा, हां ए खेलै अनमोले धन में।
दोहा:- साधु वृक्ष सत् नाम फल, शीतल शब्द विचार। जग में होते सन्त नहीं तो, जल मरता संसार ।।
भजन-155
( तर्ज:- बहना सतगुरु धोरे चाल )
टेक:- बहना रटले न करतार, सब छोड़ के हेरा फेरी।
1. क्यूं ना राम नाम रस घूटै, बंध ले गोबिन्द के खुटै। एक दिन छूटैगा संसार, दे काल अचानक घेरी।
2. सब दाग जिगर के धोगी, फल सही अगत में बोगी। हे वा होगी मीरां पार, थी हर की माला टेरी।
3. क्यूं भूल में धोखा खाया, बिन समझे मन ललचाया। हे या माया सै बेकार, क्यूं करती मेरा मेरी।
4. सब मोह माया ने तज ले, नित हरि भजन में रज ले। बहना भजले कृष्ण मुरार, हो विपता हल्की तेरी।
5. कह चन्द्रभान ला धुन ले, कर दान दया कुछ पुन ले। सुन ले सनतों का प्रचार, कर सत्संग शाम सबेरी। बहना रट ले ने करतार,
दोहा : गुरु समान दाता नही, याचक शिष्य समान। तीन लोक की संपदा, सो गुरु दिन्ही दान॥
भजन-156
( तर्ज:- ले चल साजन )
टेक:- ध्यान हरि का धर बन्दे जै चाहवै सुख पाना। राम नाम आधार बिना होगा दुखड़ा ठाना।।
1. कंचन बरगी खोड़ तेरी की एक दिन होज्या धूल। ब्याज के लालच में फंस बन्दे खो दिया असली मूल। बो कै पेड़ बबूल, आम का फल कोन्या थ्याना।।
2. रंग बिरंगा फैशन बाणा बदले बारम्बार। एक बर बाण बदल ज्या तो बस होज्या बेड़ा पार। यह सन्तों का प्रचार, भूल मत नाम हरि गाना।।
3. पकड़ सहारा राम का होज्या इसमें लवलीन। जैसे आसरा नीर का नहीं पल भर तजती मीन। मन में राख यकीन, टेम ना बार-बार आना।।
4. काम क्रोध मद्य लोभ तृष्णा इनके घाल नकेल। ममता माया धन जोबन सब एक दिन होजां फेल। कुछ ना चालै गेल, साथ में राम नाम जाना।।
5. मनसा वाचा कर्मण से तू सही जमाले ध्यान। चंद्र्भान सन्त कहते तेरा हो ज्यागा कल्याण । मान चाहे ना मान, मेरा था काम समझाना।।
भजन-157
( तर्ज:- चौकलिया )
टेक:- भगत बचैया कृष्ण कन्हैया मन मोहन गिरधारी। कष्ट मेट दे पल में आ जो रटले शाम सवेरी ।।
1. प्राचीन इतिहास एक जंगल में हिरनी ब्याई। दो बच्चे करें खेल खिलारी आनन्दी सी छाई । चोंच देनियां चुगा भी दे करता आप सहाई। रंग में भंग पड़ग्या एक दिन थी नई मुसीबत आईइईं। करकै प्रबन्ध मारन खातिर आग्या एक शिकारी ॥
2. बेदर्दी ने एक तरफ तै आकै ला दिया जाल। दूजी तरफ कर लकड़ी कट्टी अग्नि दी थी बाल। तीजी तरफ खड़ा कुत्ता कर दिया संदक दिखे काल। चौथी तरफ निशाना बांधे खुद बैठी चंडाल। हिरनी कहन लगी सुध लो आज दीनानाथ हमारी ।।
3. सुनी टेर हिरनी की थी वह दुष्ठ नाग ने खाया। हुआ निशाना टेढ़ा था कुत्ते को मार गिराया। चली हवा अग्नि ने सरक पापी का जाल जलाया। मारनिये से बचानिया ठाड़ा हे भगवन तेरी माया। दीन दयालु कृपालु कहै साची दुनियादारी।।
4. जिसको राखे साई उसे कोई मार नहीं सकता। हर ने दिया चढ़ा-गिरा संसार नहीं सकता। सन्तों के सत्संग बिन हो उद्धार नहीं सकता। चन्द्रभान भगवान भगत कभी हार नहीं सकता। वेद पुराण साक्षी हैं सब सन्त मुनि ब्रहमचारी ।।
दोहा:- संगत कीजे सन्त की, जिनका पूरा मन। अनतोले ही देत हैं, नाम सरीखा धन।। आए हैं सो जाएंगे, राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ चले, एक बांधे जंजीर।।
भजन-158
( तर्ज:- मेरे नटवर नन्द किशोर )
टेक:- हरि नाम मुख बोल, संकट मिट ज्यागा।
1. राम भजन में लीन जो रहते, नहीं उखड़े की कौडी कहते। जमें के लाखों मोल, जै मनवा डट ज्यागा।
2. पाप ने सहम रहा दबको रै, आगे चाले नहीं लहको रै। उड़े खुलज्या सारी पोल, पैंतरा कट ज्यागा।
3. रोज करा कर भजन बन्दगी, दूर भगा दे विषय गन्दगी। मन की घूंडी खोल, तो पूरा पट ज्यागा।
4. सत्संग की जै आध घड़ी हो, हजार वर्ष के तप से बड़ी हो। सनतों का यह तोल, ना माशा घट ज्यागा।
5. चन्द्रभान ये सन्त बताते, दोष हैं सत्संग में खू जाते। बजै ज्ञान का ढोल, यो औगुण हट ज्यागा। हरि नाम मुख बोल...
दोहा:- जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति ना होय। नाता तोड़ हरि भजै, भक्त कहावै सोय ।।
भजन-159
( तर्ज:- सादा )
टेक:- आशा तृष्णा कर काबू में अपने मन को मार लिये। किसी किस्म का खटका ना हो भवसागर तैं पार लिए॥
1. तृष्णा बीज विघ्न के बोकै बने काम ने अटका दे। दोनूं दीन बिगाड़े सै या अधम बिचालै लटका दे। | ठगनी छतिया बनकै पापन सही रास्ता भटका दे। अपनी माया से कर पागल जादू कैसा झटका दे। सर्प पोंनिया बन डसज्या यो हो इस तैं होशियार लिए॥
2. एक के मारे पांच मरें पांचों से पच्चीस मर जाते। दसों का कर दमन सदा तो सारे काम सुधर जाते। तुरिया पद में आसन ला जो भजन हरि का कर जाते। सत् चित् आनन्द धाम मिलै वह बहतरणी से तिर जाते। सुबह शाम ले हरि नाम तूं अपनी अगत सुधार लिए।।
3. हरि ओम् संकट ने टालै राम नाम सुखदाई हो। भीड़ पड़ी में रक्षक बनज्या हर की आप सहाई हो। जितनी माला फेरी जां वा अगत की खास कमाई ही। आम के आम गुठली के दाम कुछ करले ख्याल भलाई। मनसा वाचा कर्मण से रट 3% नाम हर बार लिए ।।
4. बिना विचारे काम करे तैं हो ज्यागी विपता ठानी। अन्त समय पछताना हो या टेम फेर कोन्या थ्यानी। चन्द्रभान कह मिटज्या फेरा वेदों की है यह बाणी। सतगुरुओं की करते सेवा मोक्ष गति जै हो पानी। लाके फुरसत आध घड़ी सुन सन्तों का प्रचार लिए ।।
भजन-160
( तर्ज:- दाग जिगर के धोवै )
टेक:- श्यान दिखा दो प्यारी, घर आओ श्यामा।
1. बिरच रही थी एक चंडाली, बच्चों की करी तनै रखवाली । वा पूतना राक्षसी मारी, घर आओ श्यामा।
2. केश पकड़ के कंस पछाड़ा, कुलिया पीड़ पै बोला धाड़ा। करगे खेल खिलारी, घर आओ श्यामा।
3. कुब्जा का तनै कष्ट मिटाया, रुकमण का भी प्रण पुगाया । करके ने होशियारी, घर आओ श्यामा।
4. गोपनियों का दिया साथ हो, राधे का भी पकड़ा हाथ हो। मोहन श्याम मुरारी, घर आओ श्यामा।
5. इन्द्र ने प्रकोप दिखाया, उंगली ऊपर पहाड़ उठाया। गोवर्धन गिरधारी, घर आओ श्यामा।
6. कह चन्द्रभान सन्त की चेरी, प्यास बुझाओ करी क्यूं देरी । कर मैं बाट देखती थारी, घर आओ श्यामा।
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