भजन -51
दोहा: निराकार की आरसी, सन्तन की है देह। लखा जो चाहे अलख को, इनमें ही लख लेय।।
( तर्ज:- ना कटें चौरासी के जाल )
टेकः- तेरा होज्या बेड़ा पार, सन्त के सत्संग से।
1. जाया कर तू शाम सवेरी, मिटज्या लाख चौरासी फेरी। हो ज्यागा उद्धार, सन्त के......
2. जहां है राम नाम का गाना, और दूसरी चीज का डा ना। होज्या जय जयकार, सन्त के......
3. रोग दोष का खात्मा होज्या, पवित्र तेरी आत्मा होज्या। होजां शुद्ध विचार, सन्त के...
4. यह संसार मुसाफिर खाना, दो दिन डटकै सबने जाना। तू ले न अगत सुधार, सन्त के...
5. कह चन्द्रभान हर ज्ञान वही है, जहां सन्त भगवान वहीं है। तेरी नहीं होवैगी हार, सन्त के.... तेरा होज्या बेड़ा पार...
भजन-52
तर्ज : चालो देन बधाई हे
1. तुम किसी भूल मे सोइ हे, सुन लो संता की बानी। सदा व्रत बँटे फिर भी भुखी, कर चेती क्यु मौका चुकी। सुखी ज़िन्दगी खोइ हे, हे बिन अकल फिरै उभानी।।
2. संशया मिटज्या तीन ताप की, माला ले लो सन्त जाप की क्यूं पाप की खेती बोई है, हे धन माया सभी बिरानी।
3. सहजो, कर्मा, मीरांबाई, सनतां की जिनने महिमा गाई। _ राही मोक्ष की टोही हे, हे आज हो रही अमर कहानी।।
4. कह चन्द्रभान अजमालो झटका, सन्त शरण का लूटकै लटा। खटका ना रहे कोई हे, हे या समों फेर ना आनी। तुम किसी भूल में.........
दोहा:- सत्संग की आधी घड़ी, तप के वर्ष हजार। फिर भी बराबर न तुले, सनतां किया विचार ।।
भजन-53
( नौ लख तारां बीच चन्द्रमा )
टेक:- दर पै सन्तां के जाकै हे, में हरि भजन गांऊ सूं। हे सुन ले बाहण मेरी मैं, नित सत्संग में जाऊं सूं।।
1. ब्रह्मा विष्णु महादेव है, सब गुरु को उच्च बताये । सच्चा मार्ग सही दिखा के, गोबिन्द से गुरु मिलावें। पांचों ठग ना धॉरे आवै, न्यूं सतगुरु ने ध्याऊं सूं।।
2. सत्संग की एक आध घड़ी में, नहीं धोरे पाप रहे से । तन की मिटे ज्लानी सारी, फिर मन भी साफ रहै सै । उड़े निरमल गंगा आप बहै सै, मै मल मल के नहाउ सु । ।
3. संत दया से संसय मिट ज्या, एक खिले ग्यान कि जयोती । सदाव्रत बटै फिर भी भूखी, क्यूं डले स्वर्ग में ढोती। गुरु बिन गति कती ना होती, न्यूं मुक्ति पद चाहूं सूं ॥
4. कह चन्द्रभान सब झंझट मिटजां, हे सन्त शरण में आकै । रोग दोष का होजै सव्रात्मा, हे सन्त रसायन खाकै । सतगुरुवां के दर पै जाके, मन चाहा फल पाऊं सूं।।
दोहा:- ऐसा सद्गुरु खोज कै, रहिए चरणन लाग। मिटे जन्म की कल्पना, ताके पूर्ण भाग।।
भजन-54
( तर्ज:- चौकलिया )
टेक:- तन के साफ करे तैं कुछ ना मन को साफ बना बन्दे। तुरिया पद में आसन लाके गुण गोबिन्द के गा बन्दे।।
1. पांच तत्व का बना पुतला जीव बुलबुला है जल का। थोड़ी देर का झटका सै नहीं भरोसा है पल का। मेला मेली धक्का पेली किस्सा है सब हलचल का। दो दिन की मेरा मेरी में झूठ जगत का है खलका। देख पराई चोपड़ी मत अपना जी ललचा बन्दे॥
2. वहां क्या-क्या कह कर आया था कर बादे सारे भूल गया । माया रुपी बैठ सिंघ पै सहम नशे मैं टूल ग्या । मात पिता सुत दारा देख के गद्गज हो के फूल गया । करा कराया भजन बिना तेरा सारा काम फजूल गया । तन्नै आंख मीच सब काम् करा कुछ ना सोचा ना भा बंदे ।।
3. काम, क्रोध, मद्द, लोभ, तृष्णा बिल्कुल मन ने कै । दसों इन्द्री बस में करके अपनी अगत सुधार लिए। आप मरें स्वर्ग मिलैगा पक्का सोच विचार लिए। जै खैर चाहवै ज्यान की कर राम नाम तैं प्यार लिए। देर है अन्धेर नहीं वहां होगा सच्चा न्याय बन्दे।।
4. कह चन्द्रभान जिंदगी ऐसी जैसे मिट्टी का मटका। ठेस लागते जरा सी फूटै एक मिनट का ना अटका। शाम सवेरी राम नाम और सत्संग का ले ले लटका। सीधा जा बैकुण्ठ धाम ने किसे किसम का ना खटका। बहतरणी तैं पार होण का यो सीधा सा है राह बन्दे।।
दोहा:- मन के मते न चालिए, मन के मते अनेक । जा छोड़े दरिया में, जां बलि लगे ना टेक ।। चाहता था भवसागर तरने, मारी मन की दौर । गुरु आज्ञा मानी नहीं, पड़ा नरक की ठौर।।
भजन-55
( तर्ज: - चौकलिया )
टैक : पापी मन चंचल के मते संग मुर्ख रास करै मतना। पलक पलक मै रंग बदलै इसका विश्वास करै मतना।।
1. यो बोवै पाप के काँटे धर्म के बिरवे कति उखाड़ दिये । दिन धौली मै डालें डाका बस्ते ढ़ूंढ़ उजाड़ दिये।। 88 हजार वर्ष के जप-तप जड़ मूल तैं पाड़ दिए। कनपाड़े इसने करे गृहस्थी दोनों दीन बिगाड़ दिये। दस इन्द्री बस में करले तू इसकी दास करे मतना।।
2. पांच ठग इसके साथी ना कती कहे तै बाहर रहें। होवे इशारा नहीं ढील डाका मारण नै तैयार रहैं। पच्चीसों का काम यही ये चित की टोहती सार रहें। दसों में करदे गड़बड़ फिर मनुष्य कती लाचार रहैं। नौ नाड़ी 72 कोठां में पाप का बास करै मतना ॥
3. आँखां पै चरबी छाज्या यो मानस ने करदे अन्धा। बुद्धि पै पत्थर पड़ज्या ना सोचन दे अच्छा मन्दा। हाथ हथकड़ी पांया बेड़ी गल में घाल देवै फंदा। चौगिरदे तै जकड़ देवै ना लिकड़ सके बिल्कुल बन्दा। अपने पां पे मार कुल्हाड़ी खुद अपना नाश करे मतना।।
4. मुर्ख नर अज्ञानी बनकैे मतना जन्म गाव तू। करले काम भजले नै राम ना अन्त समय पछतावै तू। राम मिलन का ढंग हो क्यूं ना सतगुरु सही चनावे तू। कह चन्द्रभान हो मोक्ष गति जैं सन्त शरण मै जावे। गिने गिनाए अनमोले ये वृथा सांस करै मतना ।।
दोहा: जब लों सुमिरे ना हरि, जो सन्तन के मीत। बहु दिन गिनती में नहीं, गए वृर्था कद में सब बीत।।
भजन-56
(तर्ज:- जिया बेकरार है)
टैंकः- ये मतलब का संसार है सब जीते जी का प्यार है रे रठ ले ओम नाम तू भवसागर से पार है
1. काम क्रोध लोभ, तृष्णा इनका त्यागन कर दिल से। । दी पक में कर ले बचज्या जग की हलचल से। | कर व बस काया का उद्धार है, मेरा यही विचार है।। रटले....
2. यह संसार मुसाफिर खाना डटना है दो दिन डटले। आखिर एक दिन वहीं है जाना सच्चा ओम नाम रटले। प्री जहां धर्म का दरबार है, सच्चा वो करतार है।। रटले....
3. मध-जोबन में अन्धा हो कै पाप नशे में टूलै क्यूं। जा नर तन मुश्किल पावै बन्दे राम नाम नै भूलै क्यूं। जम बो निराकार साकार है, तेरे जीवन का आधार है।। रटले....
4. चन्द्रभान ले सन्त सहारा नैया पार लगे तेरी। मोह माया में फंसना धसना दो दिन की मेरा मेरी । तू संभल जा अखितयार है, यह सन्तां का प्रचार है।। रटले.....
भजन-57
टेक:- तेरा हो ज्यागा कल्याण, सन्त का सत्संग कर।
1. सत्संग करले शाम सवेरी, छुटज्या लाख चौरासी फेरी। धर सतगुरु का ध्यान, सन्त का सत्संग कर।
2. जिस पै दया गुरुवों की होज्या, सारे दाग जिगर के धोज्या। होज्या शुद्ध इन्सान, सन्त का सत्संग कर।
3. सन्त समागम जो हैं करते, जितने पैर जमीं पै धरते। होते यज्ञ समान, सन्त का सत्संग कर।
4. सन्त मनन से हो निस्तारा, मन का सभी मिटे अंधियारा। हो हृदय में ज्ञान, सन्त का सत्संग कर।
5. सन्तों की जब खुड़कै घण्टी, नहीं चूक पक्की गारन्टी। दर्शन दें भगवान, सन्त का सत्संग कर।
6. सन्त शरण में संकट टलज्या, मोक्ष गति का परमिट मिलज्या। न्यूं कहता चन्द्रभान, सन्त का सत्संग कर।
दोहा:- कथा कीर्तन करन की, जांकी निशदिन रीत। कह कबीर वा दास से, निश्चय कीजे प्रीत ।।
भजन-58
( तर्ज:- भक्ति कर भगवान की )
टेक:- लाके फुरसत दो घड़ी, सत्संग के में जाया कर। पहुँच सन्त के धाम पै, हरि कीर्तन गाया कर।।
1. काम, क्रोध, मद्या, लोभ, मोह, ये पांचों दुश्मन तेरे हैं। मौका लगते दाव चलादे, ये डाकू ठग लुटेरे हैं। की। आशा तृष्णा मार के, मन पै काबू पाया कर...
2. सन्त समागम हरि कथा, ये बड़भागी को मिलते हैं। सत्संग की आधी घड़ी से, रोग दोष सब टलते हैं। एक पंथ दो काज हों, सोच कै फायदा ठाया कर।।
3. जितनी नीत हराम में है, इतनी हर में होय भी। सीधा मुक्ति धाम मिलैगा, रोक सके ना कोय भी । सत्संग गंगा धार है, नहा के ने शुद्ध काया कर॥
4. खैर चाहवै से ज्यान की, तो उस ईश्वर का नाम ले। सच्चा उसी का नाम कहैं सैं, जो गिरते ने थाम ले । हरि नाम की औषध तैं, तन का ताप मिटाया कर।।
5. यह संसार स्वप्न की माया, चिड़िया रैन बसेरा है। जीते जी की मोह माया, ना अन्त समय कोई तेरा है। कर ख्याल हरि के नाम पै, कुछ तो ध्यान जमाया कर॥
दोहा:- कबीरा यह तनु जात है, सके तो ठौर लगाय। कै सेवा कर साथु की, के हरि के गुण गाय।।
भजन-59
( तर्ज:- साथन चाल पड़ी )
टेक:- कट जांगे सब फन्द बाहण मेरी राम भजो। हो जांगे आनन्द बाहण मेरी राम भजो ।।
1. जिसने हर में सुरती लाई, सीधी मिली मोक्ष की राही। मन का मिटज्या गन्द, बाहण मेरी राम भजो॥
2. या जीते जी की मेरा मेरी, एक दिन हो काया की ढेरी। जीना सै दिन चन्द, बाहण मेरी राम भजो।।
3. जागा दसवां द्वार फूट हे, एड़ा पिंगला सुखमण छूट है। सब नाड़ी हो मन्द, बाहण मेरी राम भजो।।
4. राम नाम का रट्टा लाले, अपना सच्चा ध्यान जमा ले। दर्शन दे गोबिन्द, बाहण मेरी राम भजो।।
5. मिल ज्यागा तनैं स्वर्ग किनारा, चन्द्रभान होज्या निस्तारा। गाले हरि के छन्द, बाहण मेरी राम भजो।॥।
भजन-60
(तर्ज:- हां ए तू बहुत विषयों में खेली )
टैक:- हां ए कर ख्याल अगत का बहना, ले मान सन्त का कहना।
1. झूठा जग का गोरख धन्धा, ख्याल छोड़ दे कच्चा मन्दा। हां ए बस दूर विषयों से रहना, ले मान...
2. भर्म भरोटा बान्धै कल का, नहीं भरोसा एक भी पल का। हां ए सै झुठे फन्द में फहना, ले मान....
3. चलती ने मिलै पतला सेला, साथ चलै ना पाई हांए तेरा माल द्रव कुछ है ना, ले मान...
4. लादे राम नाम की रटना, सच्चे नियम धर्म पै डटना। हां ए कदे पाप की होती जय ना, ले मान...
5. श्रद्धा कर गुरुओं की सेवा, पार लगा देंगे तेरा खेवा। हां ए कह चन्द्रभान फिर भय ना, ले मान...
दोहा:- गुरु को कीजे दंडवत्, कोटि-कोटि प्रणाम । कीट न जाने भूंग को, गुरु करले आप समान।।
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