भजन- 21

 ( तर्ज : परदेशी मेरा दिल ले गया ) टेक गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु महेश बतावै । पार ब्रह्म हों गुरूदेव ही इसलिए शीश झुकावँं ।। 1. दयानिधि दीनन हितकारी, गुरुदेव भव बन्धनहारा | गुरु की महिमा हो भारी, सब मन के भ्रम मिटावें । ।

2. गुरु ज्ञान के हों सैं दाता, गुरु सेवा से मोक्ष मिल जाता। सबसे ऊंचा हो नाता, गोबिन्द से गुरु मिलावें ।।

3. जिसने नाम गुरु का टेरा, चौरासी लाख का छुटज्या फेरा। मिटज्या सकल अन्धेरा, गुरु जी ऐसी जोत जगावैं ।

4. गुरु की मेहर फिरै जिस नर पै, सीधा पहुँचे हरि के दर पै। गुरु का पंजा हो सिर पै, तो चेले ना घबरावैं ।।

5. चन्द्रभान गुरु की सेवा, ऋद्धि -सिद्धि गुण विद्या देवा। पार उतरज्या खेवा, गुरु ऐसे सन्देश सुनावँं ।।

बार्ता:- बाल भक्त श्री चन्द्रभान जी गुरु जी के संकेत को तो समझ ही चुके थे। गुरु जी का अन्तिम समय सोचकर उनका दिल भर आया। आँखें डबडबा आई । हृदय में एक अद्भुत हलचल मच चुकी थी । अत: वे गुरु जी से कुछ परे होकर अपने मन की भांप हल्की करना चाहते थे परन्तु गुरु जी उन्हें पास बुलाकर इस प्रकार कहने लगे ।

भजन-22

( तर्ज:- शब्द तू ध्यान हरि तै लाले ) _ टेक:- तू ध्यान उरे ने लाले ना फिर पाछँ पछतावैगा।

1. ओम रटे तैं फंदा कटज्या हृदय का मिटज्या काला। गुरु ज्ञान की जुगती तैं बेकार श्रम का हो ताला। तू आवागमन छुटा ले, जै गीत हरि के गावैगा।

2. यो संसार दुखां का घर सै हरदम रहै धक्का पेली। धर्म कर्म ही साथ चलैगा 3० ही मन का हो मेली। तू सच्ची सुरत जमा ले, ना बिल्कुल धोखा खायैगा |

3 हरि भजन में लीन मगन मनै खूब कमाई कर राखी । कुछ तो ले जां गेल अपनी कुछ तेरे लिये छोड़ी बाकी । तूं बांट-बांट के खाले, तेरे कोन्या घाटा आवैगा।

4. बड़े बड़ाई नहीं तजैं ना छोटे तजैं उत्पात कहैं। ही कुछ विष्णु का घटा नहीं भृगु ने मारी लात कहैं। शील गंग में नहाले, तो आनन्द सा छा जावैगा।

5. मेरा नाम चलावण का बस फर्ज तेरे जिम्मे गेरा। परोपकार करें जाइये यो कहन आखरी सै मेरा। सही मन में जोड़ लगाले, तू मन चाहा फल पावैगा।

6 चन्द्रभान गुरु का कहना कर कुछ ख्याल अगाड़ी का। घोड़ा, विद्या, फेरे बिन कहैं पान सिडे पनवाड़ी का । जब पानी मुलतान ने जाले, फिर खाली तूम्ब हिलावैगा।

वार्ता: - भक्त जी इस बात को समझ ही चुके थे कि गुरु जी का अन्तिमसमय नजदीक है। गुरु जी की बातों से भी स्पष्ट प्रकट हो रहा थाअत: हाथ जोड़कर और दिल समझा कर भक्त जी ने गुरु जी ऐे इस प्रकार प्रार्थना की ।

भजन-23

तर्ज : बड़भागी घर होवै सन्तां का सत्संग ) बात कहो सो कुछ न्यारी, गुरू जी आज तो।

1. दे रहा सै के आज दिखाई, तड़कै-तड़क के मन में आई। खोलि ज्ञान पिटारी, गुरु जी आज तो।

2. किसी उचाटी लगी गात में, उठो बैठो स्यात स्यात मै के दुख हो गया भारी, गुरु जी आज तो

3. सुन के थोड़े दिन का जीना, मेरे गात मै छुटा पसीना मारे पड़े ब्रेह्मचारी, गुरु जी आज तो

4. मेरी आँखां तैं पड़ता पानी, बोल अटक घर्रागी बानी तबीयत में बेकरारी, गुरु जी आज तो।

5. कुछ भी कोन्या चीज सुहाती, उथल-पुथल जी धड़कै छाती। सुन के बात तुम्हारी, गुरु जी आज तो।

6. रखो अकीदा गुरु जी मन में, नाम आपका करूं रोशन मैं । कह चन्द्रभान पुजारी, गुरु जी आज तो।

वार्ता:- इतनी बात सुनकर गुरु जी भक्त जी से कहने लगे कि बेटा मृत्युवार्ता अटल है। टाले से नहीं टल सकती मेरी आत्मा इस संसार से प्रस्थान करने वाली है। तुम अपना काम सच्ची लग्न से करते रहना, सफलता अवश्य मिलेगी । अन्त में गुरु जी इस प्रकार भक्त जी से कहने लगे ।  

भजन -24

(जरा सामने आओ छलिये )

 टेक : सुन बात भक्त जी मेरी इब वक्त आखरी आ रहा! सै कुछ बी कोन्या देरी जल्दी हो कूंच नकारा!

1. मतना बात समझिये झूठी। पीज्या ओम नाम की घुटी, भक्ती सै चीज अनूठी, तेरा कर देगी निस्तारा ।।

2. ले कै सच्चे गुरु का शरना, हरि भजन में सुरती धरना । हो एक दिन सबने मरना, यो लुटज्या चमन हजारा।।

3. यो संसार मुसाफिर खाना, दो दिन डट के सबने जाना। मत माया देख लुभाना, तनै भेद बता दूं सारा।।

4. चन्द्रभान पूरा नेह लाकै, मोक्ष मिलैगी हरि गुण गाके । इतनी बात समझाकै वह बाबा स्वर्ग सिधारा।।

वार्ता: इस अवस्था में एक और परीक्षा ली। दादा का दाह संस्कार करके भक्त जी ने अपने घर को ही आश्रम बना लिया गुरु जी की समाधी बनाने का निश्चय किया गया और अपने आश्रम पर इस प्रकार तपस्या करने लगे  

भजन-25

(तर्ज:- दुलारा हो तो ऐसा हो )

टेक: गुरु की शिक्षा धारण कर पकड़ ली खास वा राही हरि गुण गान की खातिर समाधि घर पै ही लाई।।

 1. तपस्या एक वर्ष की थी, दूध, अन्न, चाय ना ली थी| न नमक बिन मीठे के फीकी, उबाली पुवाड़ ही खाई

2. मौन एक वर्ष का पक्का, व्रत चान्दरायण भी रखारखा ना अन्न का कण तलक चखा, हरि की धुन ही मन मे भाई

3. ये पांचो ठग समझा के: करा था ध्यान नेह लाके हरी के गीत गा-गा कै, है पदवी सन्त की पाईं।

 4. चंद्र्भान भज गोबिंद, कतजा फांसी जम के फनद संत नै हो के नै आनंद, हरि की महीमा समझाई

वार्ता: इस कठोर तपस्या के कारण भगवान भी दर्शन देने के लिये विवश हो गए और एक दिन श्री कॄष्ण जी की छवि भक्त जी को दिखलाई पड़ी और इस प्रकार आवाज आई

भजन-26

( तर्ज:- सादा चौकलिया )

टेक:- तेरी लग्न ने देख मगन हो आ पहुँचे गिरधारी। नवधा भक्ति देख तेरी मेरे दिल में आनन्द भारी ।।

1. चार किस्म के मेरे भक्त हों भेद बता दूं सारा। सात्वकी भक्ति करने आला चाहा करै निस्तारा। खास मोक्ष की इच्छा हो से और नहीं कुछ प्यारा। या निर्मल भक्ति करन आले ने मैं दे दूं मोक्ष द्वारा। आवागमन तै पैंडा छूट हो विष्णु पद की तैयारी ।।

2. धन माया का लोभी जो मेरे में प्रीति लावै। महल हवेली राजपाट वो स्त्री पुत्र चाहवै। जिसकी जैसी लग्न रहै वह वैसा ही फल पावै। की जमीन जोरू जर का इच्छुक राजसी भक्त कहावै । नहीं मोक्ष की चाहना उसने सुख चाहिए संसारी ।।

3. तामस भक्ति करन आला हो तोड़ खुलास करनियां । ईंट तैं इंट भिड़े शत्रु की वो याहे आस करिनयां दी अपना आपा चाहा करै दुश्मन का नाश करनियां। इसी इच्छा से भजन वो छः ऋतु बारह मास करनियां। अपनी सोचै धजा शिखर में दुश्मन की हो हारी ।।

4. नवद्या भक्ति करै मेरी जो सच्चा ध्यान लगाता। मेरे मिलन की आस होवै वह और चीज ना चाहता । खालिक मालिक राजिक रक्षक मुझको समझे दाता। सुन के टेर मैं खुद हाजिर हो उसने दर्श दिखाता। चन्द्रभान गरावड़ के या भक्ति सब तै प्यारी ।।

वार्तो:- जिस समय कृष्ण जी की छवि से यह बाणी सुनी तो भक्त जी का स्वर गदू-गद्‌ हो उठा और इस प्रकार भगवान की स्तुति करने लगे

भजन-27

 ( तर्ज:- सादा चौकलिया )

 टेक- सर्वाधार तूही निराकार गोबिन्द गिरधर घनश्याम। न्यारे-न्यारे रूप धरे तेरे एक सौ आठ नाम।।

1. ओऽम कृष्ण कन्हैया केशव हरिनारायण बिहारी तु कॄपा निधी है रक्षक ईश्वर कल्याण कारी तु मदन मोहन है व्रज बल्लब और ज्योति स्वरुप मुरारी तु सर्व व्यापक करतार अचल है गोवरधन कर धारी तु अनन्त अनादि दुखहर्ता विधाता मधु सुदन सिद्ध काम । तने भक्त उभारे दुष्ट संहारे छां गिनी ना घाम।।

2. दीन बन्धु जगदीश दीनानाथ बावन गजाधर। बंशी बजैया धेनु चरैया नन्द नन्दन दामोदर। सत्यसरूप रघुवीर माधव निरोतम अविनाशी अजर अमर। न्यायकारी साकार कृपालु गोपीनाथ और राधावर। ब्रह्म संहर्ता है पालन कर्ता स्वामिन जगत तमाम । दाता और बलभद्र शिम्भु सत्चित्‌ आनन्द धाम ।।

 3. राधा रमन है बांके बिहारी नन्द यशोदा लाल कहीं । अभय अन्तर्यामी अद्वैत दयालु दीनदयाल कहीं । भक्त वत्सल है रमणीक गुसाईं पतित पावन गोपाल कहीं । अलख अखंड अरूप अटल है पुरुषोत्तम यदुबाल कहीं । सांवरिया सुन्दरश्याम जनार्दन रघुपति अच्युत राम। पार ब्रह्म परमेश्वर निरंजन नटवर चराचर नहीं मकाम ।।

4. मोर मुकुट है सुदर्शन धारी बाल मुकन्द कमलेश तू ही । नाग नथैया घट-घट के वासी त्रिभुवन नाथ दिनेश तू ही। परम पिता निरलेप परमात्मा है पीताम्बरी भेष तू ही । चन्द्रभान कह शक्तिवान सत्यनारायण दे उपदेश तू ही । दुष्ठ निकन्दन ठाकुर यदुनन्दन द्वारकाधीश दिल थाम। करे पालना विष्णु हो कै ठीक तेरा इन्तजाम |

वार्ता: उस कृष्ण रूपी छवि ने सन्त को इस प्रकार उपदेश दिया

भजन-28

 (तर्ज:- किते सुनती हो तो माँ तौली आ )

 टेक:- भगत जगत का बैर कहैं हँस तन पर बिपता सहना। नहीं साँच को आँच कती यह सत्पुरुषों का कहना।

1. जोर लगा ले आग तपा सोने की दमक ना जाती। पत्थर पै घिसने के बाद है मेहन्दी रंग दिखाती । हिम्मत का हो राम हिमाती, आगे बढ़ते रहना ।।

2. करोंत कुहाड़ा कुटिल आदमी न्यारे करा करें सैं। सुई सुहागा सुघड़ चतुर यह टांके भरा करें सैं। सत्‌ के बेड़े तरा करें सैं, है महल पाप का ढहना।।

3. बड़े बड़ाई नहीं तजैं और अवगुन तजै गुलाम नहीं । हल्दी जदी नहीं तजै कह खटरस तजता आम नहीं । निन्‍दक ने और काम नहीं, हो झूठे फंद में फहना।।

4. देर है अन्धेर नहीं वा तिरगी मीरांबाई। लाख जतन करले कस्तूरी छिपती नहीं छिपाई। चंद्र्भान रह राई-राईं, नूण तो एक दिन बहना।

वार्ता: - इतनी बात सुन कर सन्त जी फिर भगवान की प्रार्थना इस प्रकार् करने लगे दोहा : प्राइम नए बाड़ी उपजै, प्रेम नै हाट बिकाय राजा प्रजा जेहि रुचै, शीश दिये ले आए

भजन-29

 ( तर्ज:- क्या अजब निराली है भगवान )

टेक: तेरी लीला अजब महान कुछ भेद नहीं चलता।

1. तनै रची सृष्टि सारी, बिन फौज के प्रबन्ध भारी। थारी शक्ति बिना भगवान, नहीं पत्ता तक हिलता।

2. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, तेरी कारीगरी दिखलारे । हारे ऋषि मुनि कर ध्यान, तेरा अनन्त नहीं मिलता ।

3. किसै के कुनबा भारा, कोए एकला गरीब बिचारा।

4. किते सारा घर दिखे सुनसान, कहीं खवे से खवा छिलता।

5. कोए राजा कोए भिखारी, किते छान किते महल अटारी। किसे के भूख में लिकड़े प्राण, कहीं -कहीं घी सा घलता।

6. चन्द्रभान गमी किते शादी, पैदा सो ना पैद बना दी। जब सधै वक्‍त आखरी आन, नहीं टाले से टलता।

वार्ता: - जब भगत जी ने इस स्तुति में भगवान की लीला का जिकर किया तो भगवान इस प्रकार जवाब देने लगे।

दोहा: - प्रेम हरि का रूप है, त्यों हरि प्रेम स्वरूप । एक होय दो यों रहैं, ज्यों सूरज अरु धूप ।। जहां प्रेम वहां नेम नहीं, तहां न बुद्धि व्यवहार | प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार  

भजन-30

( तर्ज:- बालक उमर नादान में घर बैठ )

टेक:- यो सुन ले सौ का जोड़ सै, हो करनी जैसी भरनी।

1. न्यारा-न्यारा सबका खाता, अच्छे बुरे का फल मिल जाता न्याकारी नया करै विधाता, हो सच्चा सही निचोड़ सै, वा नहीं कचहरी डारनी।

2. चोरी ठगी करें बदमासी, माफी उनको नहीं जरा सी । हाथ पैर कट लगज्या फांसी, सड़े नर्क में खोड़ सै, हो झूठी बौर बिखरनी।

3. बुरी नजर रहै ख्याल हो गन्दा, चुगली करैँ पराई निन्दा। गूंगा कोढ़ी होज्या अन्धा, हो अधम बिचाले तोड़ सै, नहीं पार करै बहतरनी।

4. दया धर्म में जो नीत लगाते, साधु सन्त की टहल बजाते। चन्द्रभान नहीं जीव सताते, उन्हें मिले स्वर्ग में ठोड़ सै, जो ले रहे राम समरनी।

वार्ता: - भगवान ने भगत को उपदेश दिया कि संसार में दुख सुख सब अपने कर्मों के अनुसार हैं। जो जैसा करता है, बैसा ही फल पाता है इसके बाद कृष्ण की छवि अंतर ध्यान हो जाती है इसके बाद संत जी ने भगवान का उपदेश जनता मे फैलाया श्रद्धा से लोग आपको भक्त जी तो कह्ते थे आपके आश्रम पे सत्संग प्रेमियो की भीड लगने लगी लोगो के दिलो मे आपकी प्रेम बानी का बहुत गहरा प्रभाव पडा यह बात सन 1955 की है जबकि गरावड़ गांव मे केवल प्राइमरी स्कूल ही था बिना मिडल स्कूल के बच्चे इधर उधर के गांव मे शिक्षा लेने के लिये आते थे पैदल चल कर छोटे छोटे बच्चे दुख का अनुभव करते थे सत्संग प्रेमियो ने यह दिख गुरुजी को बतलाया और उंसे यह दुख निवारण करने की प्रार्थना की संत ने परोपकार का बीड़ा उठाया और जनता को पढ़ाई का इस प्रकार संदेश देकर स्कूल बनाने के लिये उत्साहित किया