भजन-281

 ( तर्ज:- गंगा जी तेरे खेत में )

टेक:- 1975 साल में, एक चमक अनोखा भान, चन्द्रमा गेल था, हो किसी शुभ घड़ी आईं

1. नेकीराम गिरावड़के मे दानशील मशहूर हुए भूल गये शुभ कर्म करै कोए यज्ञ भी जरुर हुए आठ बजई पूरनमाशी को शक सभी के दूर हुए ब्रह्मा कहूं के विष्णु कहूँ के शिव शंकर कहु भोला हो। के इन्द्र छोड़ इन्द्रासन आग्या ले आदमी का चोला हो धन भाग उस बूली माँ के झूठ नहीं एक तोला हो। एक रेखा खिंचरी भाल में, बनी चन्दा जैसी श्यान, इसा तूं छैल सै हो, किसी शुभ घड़ी आई ।।

2. बालेपन से सन्त श्री ने ध्यान हरि में लाया था। चौबीस घन्टे सुरती हर में साल सतासी आया था। जो पंडितों ने बतलाई तनै वो हे कर दिखलाया था। गुरु बुलाए घर बैठे ने बात बनी या न्यारी हो । लगा ज्ञान का चटका झटका नगरी जानै सारी हो। भगवान समझ श्री रामकिशन बने चन्द्रभान पुजारी । तोड़े दुखों के जाल हो, मिला सतगुरु जी से ज्ञान, मिटा सब मैल था, हो किसी शुभ घड़ी आईं ।।

3. अच्छे गुण की बुद्धि फिरगी मनुवा लगा जाप के में। हुए कन्हैया प्रगट भैया गुरु चन्द्रभान आप के में। उन बन्दां के कष्ट हर जो फिरे थे तीन ताप के में । सुबह नहाना ठंडे जल से पोह में हो जाड़े का पाला। मौन रहे चाय और दूध का करा था टाला। 22 साल अन्न खाया कोन्या खुद सबका सै देखा भाला। तुम दुष्टों के लिए काल, हो गुरु दुखियों के भगवान, हुई जिसकै दहल सै, हो किसी शुभ घड़ी आईं।।

4. कष्ट दूर हो उन बंदा के जिनके मन में श्रद्धा पावे। सच्चा दिल उदगार भावना गुरु चन्द्रभान की भेंट चढ़ावे। निश्चय ही वो दर पै आके कोन्या मानस खाली जावे । दो घन्टे का आसन सब कुछ त्याग करके लाइये तूं। होजां दिल के दूर अन्धेरे खुशी तो मनाइये तूं। परे गुरु श्री चन्द्रभान के चरणों शीश निवाइये तूं। गावै कृष्णलाल सै, हो थारा सेवक सै नादान, गया थारे महल में, हो किसी शुभ घड़ी आई।।

दोहा:- राम भजो सुकर्म करो, चुगा बांट के खाय। सुख पावैगी आत्मा, जून किसे में जाय।।

भजन-282

 ( तर्ज:- समझ बिन मनुष्य ) टेक:- तमाशा थोड़े से दिन का रचा दिया खेल खिलारी नै।।

1. कर ले उस मालिक का जाप, तनै बक्शैगा अपने आप। पाप डोबैगा थारे मन का, छोड़ दियो चोरी जारी नै।।

2. हरि का भजन करो नर नार, थारी हो ज्यागी नैया पार। पार वा तार दई थी गनका, रटा था नाम बिचारी नै।

3. जात की भिलनी थी कुलहीन, भजन में रहती थी लौ लीन । देख यकीन दृढ़ मन का, तार दी अवध बिहारी नै।।

4. दुखी हो रहे दुनिया के लोग, समझे पिछली करनी के भोग। रोग चाले नए नए ढंग के, डोब दिया देश बीमारी नै।

5. कहते सदा नाथ दुर्ेश, भजन में रहना मगर हमेश। भरोसा नहीं सै इस तन का, रटा करो कृष्ण मुरारी नै।।  

दोहा: सुख देवें दुख को हरें, करें पाप का अन्त। कहै कबीर को कब मिलै, परम स्नेही संत

दोहा: - साधु बनना सहज है, मुश्किल बनना दास । दास बना जब जानिये, लहु रहै ना मांस

टेकः- सन्त ने बालक उमर नादान में घर बैठ समाधि लाई।

भजन-283

 ( तर्ज:- यो सुन लो सौ का जोड़ ) हे जी घर बैठ समाधि लाई, भजन की कर दी शुरु कमाई॥।

1. पांच साल की उम्र में आया, भक्ति के में ध्यान लगाया। भीतर बड़ कै हरि गुण गाया, कुछ ऐसी जच गई ध्यान में, फूलां की माला बनाई हे जी फूलां की माला बनाई, भक्ति छुपती नहीं छुपाई।॥।

2. फिर सतगुरु ने जाण पाटज्या, पास बुलाबे जाण तैं नाटज्या।: शरमावै कुछ दिल ने डाटज्या, गुरु आए सन्त के मकान में, चरणों में सुरती लाईं। है जी चरणों में सुरती लाई, गुरु आसन पर लिए बिठाई॥

3. सतगुरुवां के दर पै जाके, करी खुशामद मन चित्त लाकै। गऊ माता की टहल बजाकै, रहते गुरु रामकिशन के सामने चाय करके रोज पिंलाई हे जी चाय करकै रोज पिलाई, गुरुकुल में करी पढ़ाई ।। फिर गुरु का टेम आखरी आबे, चोला छोड़न ने चित्त चाहवे। ब्रह्मचारी दिल में घबरावे, कहैं गुरु मुन्शीराम की जाण मे, कृष्ण, राम रटा करो भाई कृष्ण, राम रटा करो भाई, तेरी टेर सुनैंगे रघुराई।।

दोहा:- नानक नन्हा होय रहो, जैसे नन्ही दूब। और घास जल जाएें, और दूब रहेगी खूब ।।

भजन-284

टेक:- तूं रटै न भगत, तेरी हार होन दूं ना, राखूं जीत में पाला। निर्भय होकर भजन करें जा मैं सूं तेरा रूखाला।।

1. मतना बात समझ हलचल में, खबर लेऊं सूं मैं पल पल में। फांसी घलै भगत के गल में, मैं सूं काटन आला।।

2. माणस की मैं तार दशा दूं, रोते हुए ने आप हूँसा दूं। उजड़े ढूंढ ने फेर बसा दूं; बसे के लादूं ताला।।

3. मैं ए सृष्टि रचने वाला, काल आवै जब मैं खाऊं। आदि अनादि मैं ही अन्त हूँ. दुख सुख सारे एक । मैं तेरे मन के बीच समाऊं, मैं तेरे घट की माला।।

4. नहीं किसे की कती आड लूं: अपने भगत की बाँध ठाड दूँ आँखां मैं ते ज्यान काढ़ लूँ; मैं सूं कृष्ण काला।

5. मैं सूं स्वभाव घणे नरमां का, कोन्या लेख मिटे करमा का कहना मान ले नै शर्मा का, दूं सूं तनै संभाला ।।

भजन-285

( तर्ज:- सादा )

टेक:- एक सुन्दर सी भगती देखो सतगुरु चन्द्रभान की । कलियुग के में पूजा कर लो ऐसे सन्त सुजान की ।।

1. बन बाल ब्रह्मचारी यारी खुद ईश्वर तैं कर रहे सैं। सेवा का फल मेवा हो सै ध्यान हरि में धर रहे सैं। चमत्कारी पर उपकारी ऐसी करनी कर रहे सैं। नेकी कर कुए में डाल दें जल की झारी भर रहे सैं। शक्ल दीख जा तो कुम्भ में नहा लिया समझो महन्त महान की ॥

2. गाम गिरावड़ जन्म ले लिया सन्तां की पदवी पाई। सत्संग के में जाकै देख लिया टोहली मनै दवाई। उन बन्दा का कष्ट हरा जिसने सच्ची नाड़ झुकाई। शनिवार और पणवासी ने हो सै कला सवाई। काट बीमारी बात ठिकाने कर दें हर इन्सान की ।।

3. मन्दिर, मस्जिद गुरुद्वारा और कुम्भ का नाहण तुम्ही हो। अल्ला, ईश्वर, राधेश्याम और सालग राम तुम्ही हो। महाभारत के समय के पाड़ूं अर्जुन बाण तुम्ही हो। करके तपस्या ईश्वर टोहया सच्ची खान तुम्ही हो। फूलां के में तोल धरो करो सेवा इसे महान की ॥

 4. शर्मा जी सुबह शाम गुरु जी तेरे ही गुण गावे सै। भगवन की सूं खाके कहूं यो तन मन धन ते ध्यावे से । परदेशां में पड़ा रहूं मने आपकी याद सतावै सै। घणे दिन होगे मिले नहीं मेरा फेटन ने जी चाहवै सै सन्त चालीसा पढ़ा करूं जब याद लगे तेरे ध्यान की ॥  

भजन-286

 ( तर्ज:- भगवान रटनियां )

टेक:- आं रै कुछ फायदा हो सै सत्संग की सुन बाणी।

1. किसी गांव में रहा करता जाति का था एक सुनार। मात पिता बूढ़े दोनों बेटे पूत कमाऊ चार। चोरी करने जाया करते रोजाना की याहे कार। एक दिन पिता कहने लाग्या मेरी बात का करना ध्यान । भागवत गीता रामायण जहां होता हो चाहे वेद बखान। सत्संग जहां पर होता हो वहां बन्द कर लेना अपने कान। एक पल भी ना रूकना जहां, होती राम कहानी ।।

2. एक रात ने चारों भाई चोरी करने जा रहे थे। किसी जगह पर सत्संग आले भजन हरि के गा रहे थे। देवतां के ना हो परछाई सत्संगी बतला रहे थे। करके बात याद पिता की सबका पाट लिया पौड़। छोटे नै करी उंगली ढीली बात सुनी थी या उस ठओड फिर भाइयां की गेल भार लिया मन मै लावन लाग्या जोड़ बात न सै कि झूठी या चाहिये सै आजमानी।

3. उसी रात ने जा चोरां ने राजा कै घर पाड़ लाया। हीरे पन्ने मोहर अशर्फी सोना चांदी बहुत उठाया । बांध गाठड़ी घर ने आगे चोरी की लेके धन माया। देबी का बना कै भेष तड़कै ने एक दूती आई। छोटा कहन लगा या ठग सै झूठ माट की देबी माई । बाकी सब चोरां ने मिलकै अपनी अपनी भेंट चढ़ाई । देवतां के ना हो परछाई या पड़गी बात बतानी ।।

4. एक बात सत्संग की सुनकै सब भाइयां की ज्यान बचागी। सत्संग की हो महिमा न्यारी भीड़ पड़ी में काम आगी। बुरे काम तैं कान पकड़ लिया सबकै रटना हर की लागी। छोड़ कै चोरी का धंधा नेक कमाई खान लागे। सन्त समागम हरि कथा वैं सत्संग के में जान लागे। चन्द्रभान कह दोनों बखतां भजन हरि के गान लागे। सत्संग के में आया करो जै मोक्ष गति हो पानी।। आं रै कुछ ...

 दोहा: - दुख सुख में जो सम रहै, करता प्रभु से प्यार। बाल न बांका कर सके, उसका ये संसार ।।

भजन-287

टेक:- यो सुणलो जीवन चक्र - यो सुणलो जीवन चक्र ।  गुरु चन्द्रभान बहाचारी का - गुरु चन्द्रभान ब्रह्माचारी का

1. जब साल 75 आया, नेकी घर दर्श दिखाया। घर भरग्या था महतारी का-2 यो सुणलो......

2. हुई पांच साल की उमरिया, मन भा गे थे सांवरिया फेर प्रेम मिला गिरधारी का-2 यो सुणलो......

3. फेर साल 87 आया, इनने सिर पर हाथ टिकाया। दादा रामकिशन न्यायकारी का-2 यो सुणलो......

4. फेर सत्संग शुरू करा था, दुखियों का कष्ट हरा था। गया पैंडा छूट बीमारी का -2 यो सुणलो......

5. इनने भगवान करे न्यू बस में, जणू भवंरा फूल के रस में । किसा रंग खिला फूलवारी का-2 यो सुणलो......

 6. एक साल का मौन करा था; अन्न खाये बिना सरा था। यो सुणलो....

7. इनने खुब करे भंदारे, पनवासी और शनिवारे दिया भो लगा गिरधारी का-2 यो सुणलो......

8. फेर गये समाल्खा मण्डी, गोहाने में फिर आ गई झंडी जहा धाम बना ब्रह्चारी का-2 यो सुणलो......

9. फेर चैत बदी छठ आई, गुर चले स्वर्ग की राही वो दिन था रात रविवारी का-2 यो सुणलो जीवन चक्र-2

 दोहा:- पर सेवा सम पुण्य नहीं, पर पीड़ा जो पर हित पीड़ा सहै। उसे  

दोहा:- शील रत्न मोटा रत्न, सब रत्नों की खान। तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ।।

भजन- 288

 टेक:- हे भगवान तेरी कृपा तैं बिगड़ी बात समर जागी। इन भगतां की झोली भरदे मेरी तो आपे भर ज्यागी।।

1. के मांगू भगवान तेरे तैं मनै मांगना आता ना। तन मन धन करूं तेरे हवाले और मनै कुछ चाहता ना। सेवा सुमरन सत्संग में, मेरी सारी उमर गुजर ज्यागी।

2. जग के पालन हार स्वामी तेरे हाथ में डोरी सै। बीच भंवर में नैया मेरी इब डूबन ने होरी सै। हाथ लगा कर पार तार दो, परले पार उतर ज्यागी।।

3. चौबीस घन्टे तेरे भजन में मगन रहूं तेरे चरणों में । ऐसी कृपा करो मेरे प्रभु दुखी रहै ना कोई दुनिया में। हरि नाम की वर्षा कर दो, काया मेरी सुधर ज्यागी॥

4. जब तक सूरज चांद रहैगा नाम रहे तेरा दुनिया में। तेरे नाम का सत्संग हो रहा दर्शन दो ऋषि मुनियां में । बिन मांगे सब आप मिलैगा, ठाढ़ी झोली भरज्यागी।।

5. झांक जरा तूं अपने दिल में मिले निराली शक्ति रे। उस ईश्वर का ध्यान धरो तेरी पाई तक ना लगती रे। श्री चन्द्रभान गुरु की सेवा से, नैया पार उतर ज्यागी।।  

भजन - 289

( तर्ज:- लाकै फुरसत दो घड़ी )

 टेकः- भक्ति कर भगवान की काम तेरे जो आएगी। पाप भरी जो आत्मा दिन दिन डुलती जाएगी।।

।. पर उपकार के भाव तूं अपने अन्दर लाता जा। दोष रत तेरे अन्दर जितने उनको दूर भगाता जा। ज्योति फिर आनन्द की आपे ही जग जाएगी।।

2. अमृत बेला हो जाग पवित्र आसन सही लगाता जा। इंश्वर के गुण धारण करकै नीचे शीश झुकाता जा। प्रीति प्राण धार के अपना रंग दिखलाएगी।।

 3. सत्संगी जो रहा हमेशा उपर उठता जाएगा। दर्शन फिर भगवान के होंगे मुक्ति पद को पाएगा। तृष्णा बन कर सेविका तेरे चरण दबाएगी।।

4. किन्तु तुने किया जो आलस इतना तुझको ध्यान रहे। दुनिया तेरा साथ न देगी साथी ना भगवान रहें। ममता माया की तुझे उल्टा नाच नचाएगी।।

दोहा:- नितानन्द निन्दा बुरी, पापों की सरदार । पकड़ चलावै नरक की, निश्चय करों विचार!

दोहा:- निन्दा कदे न कीजिए, होय जन्म की हान नितानंद इस जगत में, निन्‍दक बेइमान  

दोहा:- हे मोहन बन्सरी वाले, मेरे करदे न सिद्ध काम। गुरू की कृपा चाहिए, मेरा चरणों में प्रणाम ।।

भजन-290

( तर्ज: ओ फिरकी वाली )

टेक:- श्री सन्त चमत्कारी, हो बाल बहाचारी, गिरावड़ तेरा धाम है, तेरे चरणों में मेरा प्रणाम है ।

1. पांच साल की बाल अवस्था, हर में ध्यान लगाया । सुनी टेर जब फिरी मेहर, कृष्ण ने दर्श दिखाया । अदभुत माया, पार न पाया, करो दास पै छाया, हो अविनाशी, तुम काटो चौरासी, मुक्ति का तेरा धाम है। तेरे चरणों में मेरा प्रणाम है।

2. मैं सेवक नादान तेरा, तुम ज्ञान गुणों के दाता । ऋषि मुनि तेरा ध्यान धरैं, पर हेद भेद ना पाता। तुम्ही पिता हो, तुम्ही भ्राता, तुम संग मेरा नाता, बहाचारी, तेरा द्वारा खड़ा पुजारी, दया करना तेरा काम है। ....तेरे चरणों में मेरा प्रणाम है।

3. जो भी तेरे दर पर आया, गया नहीं वो नर खाली। सत्संग रूपी ला दी हो बगिया, तुम हो इसके माली । सबके स्वामी प्रतिपाली, करते हो रखवाली, सतगुरु दाता, जो शरण आपकी आता, हो जाता सिद्ध काम है। ...तेरे चरणों में मेरा प्रणाम है।

4. विषय वासना दूर भगाओ, गुण गाऊं मैं नित तेरे। त्रिलोकी के नाथ हाथ तुम, धरो दया केए सीआर मेरे हे भंडारी, शरण तुम्हारी आया तेरा पुजारी आपका चेला, थारे चरणों में खेला ले राख्या तेरा नाम है। ....तेरे चरणों में मेरा प्रणाम है।