भजन 71
(तर्ज:- गुरु चन्द्रभान के सत्संग में )
टेक:- हम देन बधाई आ रहे आज सन्तां की उमर हजारी हो है
1. दुखियों के सन्त सहारे सैं, ये दास जनों के प्यारे सैं। सबकी आँखों के तारे सैं, हर देख सुखी नर नारी हो।।
2. दर्शन तै सब पाप छुटैं, कहैं जन्म जन्म के फंद करैं। रोग दोष भी सभी मिटैं, या दूर कती बीमारी हो ।।
3. हो रहा सै ये हाल किसा, जानूं हो कौशल्या लाल जिसा। कुछ मन में आवै ख्याल इसा, कदे बांके श्याम मुरारी हो।।
4. दीनों के कष्ट निवारण ने, खुद अपने भक्त उभारन ने। भूमि का भार उतारण ने, जानूं हर ने शक्ति तारी हो।।
5. अद्भुत है इनकी माया, कह चन्द्रभान क्यूं घबराया। ये कर देते मन का चाहा, यहां इच्छा पूरी सारी हों।।
दोहा: - शीश सफल सन्तन नमें, हाथ सफल हरि सेव। पाद सफल सत्संग गत, तब पावे कछु मेब ।।
भजन-72
(तर्ज : आज रल मिल कड्टी सारी )
टेक: हो के चालो तैयार सखी देन आज बधाई हे।
1. पन्नवासी का शुभ दिन आया, सत्गुरुओ का जनम बताया। माया अपरम्पार सखी, याह हर नै जोत जगाइ हे।।
2. सच्चे मन से जोत जलाओ, रल मिल गीत खुशी के गाओ। लाओ मतना वार सखी, हो रही मन की चाही है।।
3. कट्टी हो के बोलो सारी, सनतां की हो उमर हजारी। प्यारी जै जै कार सखी, हो दिन-दिन कला सवाई है।।
4. सतगुरु दाग जिगर के धोने, सन्त मार्ग मुक्ति का टोहवै। होवें दूर विकार सखी, हो सतगुरु खास दवाई है।।
5. चन्द्रभान भेद ना पावै, देख के श्यान आनन्दी छातै। आवै इसा विचार सखी, जानूं आ पहुँचे रघुराई हे।।
दोहा:- गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा मांहि। कह कबीर ता दास को, तीन लोक डर नांहि।।
भजन-73
( तर्ज :- सादा )
टेक:- साधु सन्त ऋषि मुनियों का मत करियो अपमान। बेरा ना किस भेष में बन्दे मिल जावें भगवान ।।
1. तरुवर सरवर सन्त जन और चौथे बादल मेंह। परमार्थ के कारण ही यह चारों धारैं देह । सेवा से मेवा का फल ले, कहते वेद पुराण ।।
2. 60 हजार सगर के बेटे मृर्गां कैसा लारा। कपिल मुनि के लात मार कै कुनबा खपगा सारा। भोगै दुखड़ा भारा मद्य में, हो अन्धा इन्सान ।।
3. एक ॠषि नै बैर लगाकै परीक्षत के सुख जी । शमीक के गल में सांप घाल कै कितना दुखड़ा ठाया। श्राप की टक्कर में आया, कुटुम्ब हुआ हैरान।।
4. जय, विजय यें हरिपार्षद सनकादिक तैं झगड़े। त्तीन जन्म तक राक्षक बने लगे जन्म-मरण के रगड़े। बने कमजोर रहे ना तगड़े, होते फिरे बिरान ।।
5. चन्द्रभान शरण सनतों की चाहिए टहल बजानी। जीव बुलबुला जल का है या दो दिन की जिन्दगानी। होज्या खत्म प्रानी कुछ तो, कर आगे का ध्यान॥
भजन-74
( तर्ज:- बन्दे डटना सै दिन चार डे )
टेक:- बहना हो ज्यागा उद्धार, जै ध्यान हरि में लाले।
1. मोह माया में सहम टूलगी, करके सारे आज भूलगी। है पिछले कौल करार कुछ मन में जोड़ लगाले।
2. काल बली खाज्या एक छन में, सुरती लाले हरि भजन में। हे खुद आन मिलें करतार, जै सतगुरु सही बनाले।।
3. वक्त चूक होगा पछ्ताना जै चाह्वै सै मुक्ति पाना हे ओम रतो हर बार, योह नित का नेम पुगाले।।
4. धोरा धर ज्या गोती नाती अन्त मै सतगुरु बने हिमाती। हा ए चल सनतों के दरबार, सब अपने लग कदाल।।
5. कह चंद्र्भान ले सन्त सहारा, मोक्ष गति का मिले किनारा। या नैया होज्या पार, चाहे गारन्टी लिखवाले ।। बहना हो ज्यागा उद्धार...
( तर्ज:- साथन चाल पड़ी ) साथन आओ हे सत्संग में, हो सै देर।
।. सत्संग में सन्तों की बाणी, होती है जहां राम कहानी । हरि भजन की टेर....साथन आओ...
2. वहां जाके सब पाप करें सैं, हरे राम कहै आप छुटैं सैं। जन्म जन्म के फेर... साथन आओ...
3. सत्संग है अनमोल पिटारी, लूटो बनकै राम दुलारी। गुप्ती धन के ढेर.... साथन आओ....
4. राम नाम की गंग में नहालो, अपनी काया शुद्ध बनालो। जाकै शाम सवेर.... साथन आओ...
5. सकल पदार्थ है जग मांहि, कर्महीन नर पावत नांहि। हो लो चाहे बखेर.... साथन आओ...
6. सच्चा है दरबार वहां है, हो सत् का प्रचार जहां हे। फिरी सन्त की मेहर.... साथन आओ...
7. सत्संग राम नाम के मोती, चन्द्रभान कह खिलज्या ज्योति। दिल का मिटै अन्धेर.... साथन आओ...
दोहा:- जन्म जन्म भरमत फिरयौ, मिटयो न यम की फास , कह नानक हरि भजन मना, निर्भय पावहि वास ।।
दोहा:- तीन लोक नौ खण्ड में, गुरु से बड़ा न कोय। करता करे ना कर सकै, गुरु करै सो होय।।
भजन-76
( तर्ज:- हमें विश्वास भक्ति का ) टेक:- तेरे दरबार में गुरुदेव यह आशा ले के आए हैं। सन्त जन काट दो फंदा दुखों के हम सताए हैं।।
1. पुराने लेख बतलाते, जिन्हें हैं लोग ठुकराते। जो इस दर पै हैं आ जाते, वो छाती से लगाए हैं।।
2. हैं माया पांच जो ठगनी, यह चाहिए दूर सब भगनी। बुझा दो कर दया अग्नि, इन्हीं ने दिल जलाए हैं।।
3. तुम्हीं हो दीन की रक्षा, सवाली को मिले भिक्षा। तुम्हीं हो ज्ञान की शिक्षा, गुरु ने हर मिलाए हैं।।
4. दिलों के दाग धोने के, अगत में बीज बोने के । ये जीवन पार होने के, तुम्हीं ने राह बताए हैं।।
5. यह चन्दभान की गाथा, तुम्हीं हो मोक्ष के दाता तीन का ताप मिट जाता, वो रस तुमने पिलाए हैं।।. शरण राम की लेह।
दोहा: जो सीख को अहे सदा शरन्न राम कि लेह । कह नानक सुन रे मना दुर्लभ मानस देह।।
दोहा:- ये माया अटपटी, झटपट लखे न कौय । जो मन की खटपट मिटै, तो चटपट दर्शन होय।।
भजन-77 ( तर्ज:- इस मन का टिकाना )
टेक:- हो ज्यागा कल्याण तेरा जै ध्यान हरि में हो बन्दे। हरे राम के साबुन तैं ले दाग जिगर के धो बन्दे।।
1. जै भजन राम का जा गाया, तो हो ज्यागा मन का चाहया। यह नर तन है मुश्किल पाया, मत इसने वृथा खो बन्दे।।
2. तेरा सारा संकट टल ज्यागा, जै राम नाम मुख घल ज्यागा। तनै वैसा ही फल मिल ज्यागा, तू काट लिए जिसे बो बन्दे।।
3. यह धन माया की जो ढेरी, कोए साथ चलै कोन्या तेरी। हो जीते जी मेरा मेरी, तज झूठा जग का मोह बन्दे।।
4. लेने को हरि नाम कहें, हो शुद्ध काया भज श्याम कहैं। करले ने सो काम कहैं, कुछ इसमें नहीं लहको बन्दे।।
5. क्यूं चन्द्रभान हैरान रहै, करें सन्त दया सही ध्यान रहै। तेरी काया में भगवान रहे, ले ब्रह्नज्ञान से टोह बन्दे।।
दोहा:- मनुष्य जन्म दुर्लभ अति, होत॑ न बारम्बारे। तरुवर सो पत्ता झड़े, बहुरि न लागै डार॥ दोहा:- पकड़ सहारा राम का, हो उसमें लवलीन। जैसे असारा नीर का, पल भर तजै न मीन।।
भजन-78
टेक:- लगा राम का खटका सच्चा ध्यान हो गया। रमा राम में सुखी वही इन्सान हो गया।।
1. जाति का था नीच बालिया भील नाम था। आए गयां नै लूटै राह में योहे काम था। लूट मार के धन तैं कुनबा पतले तमाम था। बुद्धि पै पड़े पत्थर कोन्या चैन आराम था। रहा पाप नशे में टूल सहम गलतान हो गया।।
2. सप्त ऋषियों का एक दिन राह में आ लाग्या फेरा। धन के लोभी डाकू ने आ सन्तों को घेरा। ऋषि कहन लगे एक बात का ल्या जाके बेरा। इस महा पाप का साझी कुनबा से के नहीं तेरा। इतने शब्द सुने डाकू ने हैरान हो गया।।
3. कुनबे तै कह पाप कमाई मैं ल्याऊं सुं सारी। दोष बटालो मेरे बोलो के मरजी थारी। पाप के भागी कोन्या कुनबा करग्या इन्कारी। सारे नाड़ हिलागे बोले क्यूं अक्ल मारी। गया गात में सरनाटा खुद ज्ञान हो गया।।
4. आकै माफी मांगी बोल्या फंसग्या भूल में। पाप का बोझा ढोया सिर पै सहम फिजूल। ऊंच नीच का भेद नहीं लठ मारे धूल में। गुरु मंत्र दे दया करो मनै सही असूल में। फिरी तुम्हारी मेहर मेरा कल्याण हो गया ।।
5. राम नाम की सन्तों ने सही टेर बताई थी। मरा-मरा कह राम नाम की रटना लाई थी । दीमक चढ़गी हटा नहीं जो पकड़ी राही थी । चन्द्रभान कह महर्षि की पदवी पाई थी । रामायण रच ग्रन्थ सही विद्वान हो गया।। रमा राम में सुखी...
भजन-79
टेक:- सत्संग के मां जाने तैं तेरे हों शुद्ध ख्याल मेरी बहना। जन्म-जन्म के फंद करटैं सैं सब जंजाल मेरी बहना।।
।. सब विषयों से दर हट कै, तू हरे राम का नां रटकै। गुरु वच्चन पै सही डट के, ना पावै काल मेरी बहना।।
2. सत्संग गुण की खान होवै, सही हरि भजन में ध्यान होवे। वहां खुद हाजिर भगवान होवैं, कहैं दीनदयाल मेरी बहना।।
3. वहां जोत ज्ञान की है जगती, तू राधेश्याम की कर भगती। सत्संग में सन्तों की शक्ति, देख कमाल मेरी बहना।।
4. कह चन्द्रभान पकड़ राही, जो सन्तों ने हैं बतलाईं। रोगकटन की खास दवाई, होज्या निहाल मेरी बहना।।
दोहा: स्वांस-स्वांस हरिनाम भज, वृथा स्वांस मत खो है क्या जाने इस स्वास का, आवन हो ना हो ।।
( तर्ज:- करलों सोच विचार )
टेक:- भज गोबिन्द घनश्याम, सच्चा साथी है।
1. भक्तों का वो है रखवाला, मीरां का नटवर गोपाला। वा तिरगी रट कै नाम, सच्चा साथी है।।
2. त्रिलोकी का नाथ वही है, दुख में देता साथ वही है। ले गिरते न थाम, सच्चा साथी है।।
3. जब दुष्ठों ने भक्त सताए, छोड़ सिंहासन भाजे आए। दे दिये सब आराम, सच्चा साथी है।।
4. द्रोपदी की लाज बचाई, नाम लिया जब कृष्ण कन्हाईं। जानै जगत तमाम, सच्चा साथी है।।
5. सुध लेता कीड़ी ने कण दे, हाथी ने खाणे न मण दे। है पक्का इन्तजाम, सच्चा साथी है।।
6. मन का सारा भरम मितावै, जै गोविन्द तै मिलना चावै। तो चल सतगुरु के धाम सचा साथी है।।
7. चंद्र्भान खास ये युक्ति, नाम रटे तै मिलज्या मुक्ति। ये संतो का पैगाम, सचा साथी है।।
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