भजन-141

( तर्ज:- करलो सोच विचार )

टेक : कर आगे का ख्याल एक दिन जाना है

1. दो दिन बनले छैल छबीला, हो ज्या एक दिन नक्शा ढीला यो सिर पै खेलै काल, एक दिन जाना है।

2. के के वायदे कर के आया गम लिकड़ी सब प्रण भुलाया घलग्या मोह का जाल, एक दिन जाना है।

3. माया में क्यूं ज्यान फंसाली, जागा हाथ पसारे खाली । यो हावै पराया माल, एक दिन जाना है।

4. राम नाम संकट ने टालै, वक्त पड़े आ आप सम्भालै। सच्चा दीन दयाल, एक दिन जाना है।

5. चन्द्रभान सन्त का शरणा, जै चाहवे से पार उतरणा। भज गोबिन्द गोपाल, एक दिन जाना है।  

भजन-142

 ( तर्ज:- तेरा हो ज्यागा निस्तारा )

टेक:- कोए आवै कोए जावे, है जगत सरा भठियारे की।

1. दो दिन के ठहरन खातिर यो नकली बना ठिकाना है। आज आया कल ठहर लिए तनै परसों यहां से जाना है। क्यूं पक्का बिस्तर लावै, है जगत सरा....

2. अपना अपना वार लगा यहां पानी भरगी पनिहारी। एक चला गया दूजा आग्या चक्कर है यह संसारी । क्यूं भूल में धोखा खान, है जगत सरा...

3. पांचों त्यार खड़े दा लाए ठगी का बाजार यहां। कर। लुट ज्यागा धन माल हो कंगला रोवैगा सिर मार यहा| तु फेर पाछे पछतावे, है जगत सरा....

4. देख यहां की भूल भलैया हो गफलत मै फसग्या। आशा तृष्णा ममता माया की कीचड़ में धंसग्या। इब क्यू कर पिंड छुटावै, है जगत सरा...

5. चन्द्रभान कह टंटा कटज्या कहन मान ले ने मेरा। _ सन्तों की जा पहुँच शरण में हो बोझा हल्का तेरा। तेरी सतगुरु ज्यान बचावै, है जगत सरा भटठियारे की।

भजन-143

( तर्ज:- बन्दे दो दिन का मेहमान )

टेक:- बहना मतलब का संसार, नाम रटें हो बेड़ा पार।

1. कुटुम्ब कबीला भाई चारा, वक्त पड़े जब करे किनारा। अंत समय साथी करतार, नाम रटें हो.

2. एक को जै काबू में करज्या, पांचों की भी माँ सी मरज्या। दसों खुद होजां लाचार, नाम रटें हो.

3. पांच रतन हैं सार ध्यान धर, सन्त मिलन और हरि भर। दीन, दया और पर उपकार, नाम रटें हो.

4. मन में सुरती राधेश्याम की बाणी हो जै हरि नाम| कर्म से मिलज्या मोक्ष द्वार, नाम रटें हो..

5. चंद्र्भान कहै रतना लाइये, हरी कीर्तन निशदिन गाइये। संतो के जा के दरबार, नाम रते हो .....

भजन-144

( तर्ज:- मैं सन्त नाम का मस्ताना )

टेक : ले भजन हरि का कर बहना, जा भवसागर से तिर खहना।

 1. तू राम रटन की ले साला, तेरा बनज्या वो खुद रखवाला। नहीं रहै क्‍यां हे का डर बहना, जा भवसागर...

2. है राम नाम अमृत प्याली, तूं पीके होज्या मतवाली । आ दर्शन दें खुद हर बहना, जा भवसागर...

3. जै सच्चा ध्यान जमावैगी, तो ठगनी नहीं सतावैगी। तेरा होगा सही गुजर बहना, जा भवसागर...

4. तेरा सारा संकट मिट ज्यागा, विपता का फंदा कट ज्यागा। तू आ सन्तों के दर बहना, जा भवसागर...

5. कह चन्द्रभान यह वचन खरा, करेँ सतगुरु बेड़ा पार तेरा। तू ले नै राम सुमर बहना, जा भवसागर... ले भजन हरि का कर...

दोहा: - कबीरा हरि के रूठते, गुरु के शरणै जाय। कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहीं होत सहाय ।।  

भजन-145

( तर्ज: - सादा )

टैक:- पांच चोर इस नगरी के मां लुद॒ज्या पूंजी हेरी। सास जा क्रोध मद्य लोभ तृष्णा घाल रहे मैं चेरी।।

1. ये मीठे बोलें भीतर छोलैं ढंग निराला सै। मुंह में राम बगल में छुरी यो मोटा चाला सै। ऊपर तैं सुथरे दीखैं पर भीतर काला सै। जीभ कालजे ला लूटन का पड़ रहा ढाला सै। अपने दाव और पेच लगाकै कर दें डूबा ढेरी।

2. इनके चक्कर में फंस कै किसने फायदा ठाया। ये दे चढ़ा के मार कोए भी बचने ना पाया। पांचों के पच्चीस बनजां है बेढ़ंगी माया । ये दोनूं दीन बिगाड़े करें बेकार तेरी काया। | जन्म जन्म का बैर इसा ज्यूं केला बडबेरी।।

 3. जुगती तै मुक्ति होज्या लिए बिल्कुल मन ने मार। एक को वश में करने से ये पांचों जांगे हार। सन्त मिलन और हरि भजन से होज्या बेड़ा पार। आध घड़ी सत्संग में जा कर काया का उद्धार । सतगुरु के दरबार पहुँच क्यूं लावे सै देरी ।।

4. खत्ता मिठा स्वाद देख मत फंदे में फहना। ये चोडे कालर धन लूटैं ना बिल्कुल दे लहना। पांचो विषय की बेल बताई सन्तों का कहना। सन्त शरण में कट ज्यागी इनकी हेर फेरी  

भजन-146

( तर्ज: - तनै मिलज्या परमगति हैं

 टेक : भज गोबिन्द गोपाला, तेरी मिटजां विपता सारी हैं।

1. जै ले ले हर की माला, वो आप बनै रखवाला। करके ढंग निराला, वा मीरां पार उतारी है।

2. जिसने सुरती लाई, आ दुख में करी सहाई। जाके लाज बचाई, वा ब्याह ली रुकमण प्यारी है।

3. सब ख्याल छोड़ कै गन्दा, ले हरि भजन का धन्धा। कुब्जा का काटा फंदा, जब नाम रटा बनवारी हे।

4. ये गीता भेद बताती, है साफ-साफ दर्शाती। है दुख में सही हिमाती, बना द्रोपदी का हितकारी है।

5. कह चन्द्रभान समझाकै, सुन बहना ध्यान लगा कै। हे सतगरु धोरे जाके, तेरी कटज्या सब बेमारी है।

दोहा: - जिहवा गण गोबिन्द भज, कर्ण सुनै हरि नाम। कह नानक सुन रे मना, परिह न यम के धाम ।।  

भजन -147

तर्ज : सतसंग के मह चाल कै बहना

टेक:- सन्त मिलन और हरि भजन से तेरा सारा दुख मिट ज्यावै। हे चल सन्त शरण में तू बहना मत घबरावै।

1. सन्त शरण में चल कै बहना, हे मन चाहा फल काया में आनन्दी छाज्या, हे रोग दोष सब टलता। नहीं पांचों का चक्कर चलता, या ठगनी नहीं सतावै।।

2. तीन ताप के मेटन की है, सन्तों के पास दवाई । सतगुरु धोरे जाके बहना, खुद मिलजां कृष्ण कन्हाईं। हो ज्यागी तेरी सफल कमाई, जब मुक्ति पद को पावै।।

3. सन्त जन जहां पैर धरें हे, वहां भगवन धरैं हाथ है। सन्तां के वश में रहते हैं, सदा त्रिलोकी के नाथ हे। भीड़ पड़ी में दे के साथ हे, ये सतगुरु कष्ट मिटावैं।।

4. घर में गंगा बहन लाग रही, नहा काया शुद्ध बनाले। चन्द्रभान सन्त कहते हैं, यो मन में जोड़ लगा ले। अपना सच्चा ध्यान जाम ले, गोबिन्द तैं गुरु मिलावें।।  

भजन-148

( तर्ज:- करलो सोच विचार )

टेक:- जग का झूठा खेल खेल के पछतावे ।

।. मात पिता बन्धु सुत दारा, कुटुम्ब कबीला भाई चारा। ये जीते जी का मेल, खेल के पछतावै।

2. एक दिन पंचो तंत लिकद ज्या, दस इंद्री दस प्रान बिगड़ ज्या लगै काल कि सेल खेल कै...

3. धन माया नहीं साथ निभावे, हाथ पसारे खाली जावै। कुछ ना चालै गेल, खेल कै

4. काम क्रोध मद्दा दुश्मन तेरे, लोभ तृष्णा घालें घेरे । पांचों विष की बेल, खेल कै

5. सुपने कैसी माया पाली, आँख खुलै जब मुट्ठी खाली। सूके डंड रहा पेल, खेल कै

6. चन्द्रभान सनतों का नारा, हरि भजन से हो निस्तारा। नहीं तो दुख को झेल, खेल कै जग का झूठा खेल...

भजन-149

 ( तर्ज:- हम आ रहे देन बधाई )

 टेक:- हम आ रहे खुशी मनान आज ये नया वर्ष सुखकारी हो ।

।. संकट कष्ट मिटैं सारे, भरें अन्न धन के सब भंडारे। लगैं राम नाम के जयकारे, सुन दिल में आनन्द भारी हो।

2. नहीं काम रहै कोई झंझट का, सब विष्त क्लेश मिटै खटका। सत्संग का लूटैं लटका, हर प्रेमी नर और नारी हो।

3. भन चाही हर चीज मिलै, और प्रेम प्रीत का फूल खिलै। धर्म की ज्योति रोज जलै, और पाप रूप की हारी हो।

4. कह चन्द्रभान ये बात सही, इस वर्ष बने हर बात फहीं। में होज्या उमंग नई, जै सच्चा सन्त पुजारी हो।  

दोहा:- गोबिन्द ते गुरु अधिक हैं, यह जानो विश्वास। गोबिन्द डारे नरक जेहि, गुरु मिटावत त्रास।।

भजन-150

 ( तर्ज:- सादा )

टेक:- मोह माया और मद्य में फंस मत गाफिल हो कै । नाम रटन ने नर तन मिलग्या 3० नाम मत भूल।।

1. करोड़ों बन्ध छूट के बन्दे नर तन है पाया। चटक मटक की लगी खटक क्यूं मूर्ख गर्भाया। तड़क-भड़क और मस्ती में ना हरि भजन गाया। जिस पै बना दीवाना हो बेकार तेरी काया। जड़ चेतन का साथ छुटै सै अन्त धूल की धूल ।।

 2. पल भर पहले जिसने कह था यो घर है मेरा। प्राण पखेरू उड़ते ही हो मरघट में डेरा। धन जोबन बल रूप कोए भी साथी ना तेरा। लूटन खातिर पांचों ने तेरा दे राखा घेरा। या अधम बिचालै टूटैगी जो घली पाप की झूल।।

3. हरि नाम के सुमरन तै तेरा शुद्ध हो ज्यागा गात। अन्त समय का रक्षक सै या सुन ले साची बात। सत्संग में जा आध घड़ी चाहे भजन करो दिन रात। माया ठगनी तनै भलौवे दे मार ज्ञान की लात। तेरी काया में खुशबू ठादे यो राम नाम का फूल।।

4. चंद्र्भान कह झूठे सुख की छोड़ो लिल्कुल आस। दे दे भजन कर तज सब ममता बन सन्तों का-दास। देरी दवाई मिटज्या तीन ताप की प्यास। भगवन के संग गुरु मिलादें रख श्रद्धा चिश्यास मनसा वाचा कर्मण से तेरा बनज्या सही असूल।।