भजन-161
(तर्ज:- सुनै सभी नर नार है
टेक:- धरो हरि का ध्यान, बाहण थारा हो ज्यागा कल्याण | सुन लो बात सहदी।
।. जिसने हर तैं सुरती लाली, हिरदे की मिटगी सब काली, आनन्द हो दिल खिलगे थे। द्रोपदी की लाज बचाई, पार उतरगी मीरांबाई। सारे संकट टलगे धे। मिलगे थे भगवान, अपनी आन दिखा दी श्यान, कोन्या कसर रही।
2. भजन हरि का जो हैं गाते, आके भगवन दर्श दिखाते, राम मिलन की जो ठाणै। भिलनी राम दर्श की प्यासी, घर में आगे थे अविनाशी, सन्यासी के हो बाणै। जाने जगत जहान, राम ने रख दिया आदर मान प्रेम की गंग बही।
3. नार अहिल्या पार उतारी, मनसा पूरी कर दी सारी. बो दिए गंगा में जौ । अनसुइया की लज्जा राखी, आज तलक भी गावें साखी, बाकी कुछ भी नहीं लहको हो कै नै हैरान, बोच के कान , पी कै दूध दही।
4. भ्रजन करा कर राधेश्याम का, ले ने सहारा हरि नाम का, जल का मछली लेती ज्यूं। हरि भजन से हो निस्तारा, बहना मिलज्या सुरग किनारा, भरम भूल में फिरती क्यूं। न्यू कहता चन्द्रभान, चली चल सन्तों के अस्थान, बनज्या बात फही।
दोहा:- तनिक मान मन में नहीं , सबसों राख प्यार । नारायण ता सन्त पै, बार बार बलिहार।।
भजन 162
टैक:- मैं भूल बीच में गई ठगी, इब हरि भजन की लग्न लगी ।
( तर्ज:- ले भजन हरि का कर बहना )
1. जब नाम हरि का ल्यूं प्यारा, मेरे मन का मिटज्या अंधियारा। है जोत निराली सही जगी, इब हरि भजन की लग्न लगी।
2. मनै जग से नाता तोड़ लिया, और हरि से मनवा जोड़ लिया। मैं उसकी बनगी खास सगी, इब हरि भजन में लग्न लगी।
3. मेरा एक जगह पर मन डटग्या, इन पांचों का फंदा कटग्या। है तृष्णा सारी दूर भगी, इब हरि भजन में लग्न लगी।
4. कह चन्द्रभान रंग लाग गया, हो प्रेम सही भय भाग गया। जब सनतों की है तोप दगी, इब हरि भजन में लग्न लगी। मैं भूल बीच में गई ठगी...
भजन- 163
(तर्ज:- चौकलिया )
टेकः- डॉ दिन की जिंदगानी बन्दे कयां पर करै मरोड़ हरी भजन बिन सुनी सै तेरी कंचन बरगी खोड़॥
1. किसने जाए किसने जने और किसने लडाए लाड। बेर ना इस खोड़ के भाई कहां खिडैंगे हाड। मेरा मेरी धन माया की सहम उभर रही डाहड। अन्त समय में धोरा धरजां जिनकी माने ठाड। यम के दूत मार कै डंडे देंगे सिर न फोड़।।
2. करे प्रण ने भूल रहा तू किस गफलत में सोबै। विषय भोग और मद् में चूर हो सहम दिवाना होवबै। सांस तेरे अनमोले थे क्यूं वृधा इन ने खोबै। राम नाम का साबन ला जो मैल जिगर का धोवे। ध्यान मगन हो हरि चरण में ले ने चित नै जोड़।।
3. मनुष्य जन्म इस दुनिया मे नही मिलता बारंबार दया धरम और हरी भाजना बिन खोवै क्यूं बेकार। करे कर्म का फल दे दे वह ऐसा है दातार युक्ति से युक्ति मिल ज्या चल सतगुरु के दरबार। ग्यान ध्यान से भगवन दर्शन मिट ज्यागी घुड़ दौड़
4. आंख मिंच कै कार नीच ना रटा हरि का नाम असली धन दिया छोड़ कती नकली का बना गुलाम आशा तृष्णा ममता मार कै ले नै दिल नै थाम चन्द्रभान चल सन्त शरण में हो जांगे सिद्ध काम। पांच भूत रह जां मुंह बाए होवै खुलासा तोड़ ।।
भजन-164
( तर्ज:- मोर मुकुट बंशी वाले )
टेक:- कृष्ण मुरारी, विनती हमारी, टेर सुनो घनश्याम, नन्द गोपाला हो।
1. ब्याध को दे दी परम गति जब बाण पैर में मारा था। नारायण का नाम लिए तैं अजामेल को तारा था। नरसी का बना प्यारा था, सब करके ने इन्तजाम, बनगे लाला हो।
2. अर्जुन के बनके साथी था गीता का ज्ञान सुनाया हो। सुदामा की कंगाली मेटी पिछला प्रण निभाया हो । मोरध्वज का धर्म बचाया, जाने जगत जमाम, बन रखवाला हो।
3. धन्ने जाट की टेक राख दी तारे सदन कसाई हो। सैन भगत की संशया मेटी बनगे नन््दा नाईं हो। रविदास कै गंग बहाई, बनगा घर में धाम, दीन दयाला हो।
4. दुर्योधन की छोड़ मिठाई साग विदुर घर था खाया। प्रेम के वश भगवन होते यह सन्तों ने है फरमाया। चन्द्रभान हो मन का चाहया, भज गोबिन्द का नाम, हाथ में माला हो।
भजन -165
( तर्ज:- सत्संग के मां चाल कै बहना )
टेक:- प्रेम करे तैं ईश्वर मिलज्या ला हरि भजन में नीत। हे सुन बहना मेरी तेरी एक दिन होज्या जीत।।
1. शबरी हरि दर्श की प्यासी थी बैठी ध्यान जमा कै। राम ने झूठे बेर खुआगी हुई आनन्दी दुख ठाकै। दर्श दिखाए घर पे आके, हे सच्ची देख प्रीत।।
2. श्यामरंग में रंगी हुई थी वा सुनी हो मीरांबाई। अमृत समझ जहर की प्याली हँस झटपट मुंह के लाई। आखिर मिलगे कृष्ण कन्हाई, वह सच्चे मन के मीत॥
3. भगतां के बस भगवन हों सें, जो रटैं हरि की माला। दीन दयालु हो कृपालु, बना द्रोपदी का रखवाला। भीड़ पड़ी में संकट टाला, जब सुना दर्द का गीत॥
4. कह चन्द्रभान के लेगी बहना, बिन समझें दुख भरण में। नेह लागे तै भय सा भागे कुछ फायदा नहीं डरन में। सतगुरु की जा पहुँच शरण में, जा सुख तैं जिंदगी बीत॥
भजन-166
( तर्ज:- चौकलिया )
टेक : घमंद करैनिया के दा कटगे पेश एक भी चली नही बड़े बड़े सिर मार गए वा घड़ी मौत की टली नही
1. हिरनाकुश अभिमानी राजा हर तैं बैर लगाया था। नारायण और नर का ना कुछ भेद समझ में आया वर मांगे तैं ठाडा बनग्या बिल्कुल ना घबराया था री हो कै अन्धा गन्दापन में हरि का भगत सताया था। नरसिंह आगै पोल लिकड़गी चोट एक भी झली नहीं।।
2. घमंड बीच में रावण ने था कुटुम्ब खपाया सारा। चार वेद छः शास्त्र ज्ञाता घमंड करे तैं हारा। रामचन्द्र तैं बैर लगा नहीं टोटा नफा विचारा। जो काल ने वश में समझे था वो एक बाण में मारा। सत्य की होती जीत हमेशा दाल पाप की गली नहीं ।।
3. धरती ने तोला करते वो घमंड में एक सौ एक मरे। जरासंध शिशुपाला खपगे घमंड बीच में आन घिरे। घमंड करे तैं कंस मरा परीक्षत ने कितने दुख भरे। साठ हजार सगर के बेटे कपिल मुनि ने भस्म करे। घमंड करा जा ऋषि के दर पै धींगा मस्ती पिली नहीं ।।
4. बड़ा बोल बोलनियां हारै सन्तों की है यह ली चन्द्रभान कह जोड़ लगाले अन्त समय डगटी जानी। थोथे पिछोड़े उड़-उड़ जां ना कुछ दो । बिना विचारे काम करे तैं हो ज्यागी की मिली नहीं ।। हारे वैद्य लुकमान कहैं सैं दवा बहम का
दोहा:- गुरु मानुष कर जानते, ते नर कहिये अंध । महा मुखि संसार में, आगे जम के फंद॥
भजन-167
(तर्ज:- हां ए कर ख्याल अगत का)
दोहा : हां ए भज गोबिन्द कृष्ण कन्हाई, है कष्ट हरण सुखदाई।
।. श्याम मुरारी नन्द का लाला, दुख भंजन है दीन दयाला। हां ए जो मेटैं पीड़ पराई, है कष्ट हरण सुखदाई ।
2. साग विदुर घर खाने वाले, प्रेम से भोग लगाने वाले। हां ए सब तज कै कती मिठाई, है कष्ट हरण सुखदाई।
3. शिशुपाल का करा ढेर हे, पल भर की ना करी देर है। हां ए रुकमण की करी सहाई, है कष्ट हरण सुखदाई।
4. सन्तरी बनके देते पहरा, रक्षक बन मेटा दुःख गहरा। हां ए द्रोपदी की लाज बचाई, है कष्ट हरण सुखदाई।
5. गनका पार लंघा दी छन में, करके सुरती हरि भजन में। हां ए वा तिरगी मीरां बाई, है कष्ट हरण सुखदाई ।
6. चन्द्रभान कह सन्त बतावँँ, नाम से सब संकट मिट जावें। हां ए सै दुख में खास दवाई, है कष्ट हरण सुखदाई ।
भजन-168
( तर्ज:- हो ज्यागा कल्याण तेरा )
दोहा : राम कहें आराम मिलैगा सही रटन की जै हो चास। सुबह नहीं तो शाम मिलैगा रख दिल में पक्का विश्वास
1. भरे रितादे रीते भरदे, जिस पर नजर मेहर की करदे। भीड़ पड़ी आ काढ़ कसर दे, हरि भक्त के हों सैं दास ॥
2. हरि भजन जो निशदिन गावैं, पाप सभी मन के सिट जावैं। पांच चोर ना धोरे आवैं, तीन का होज्या तोड़ खुलास।।
3. तू ही तू ही कर शाम सवेरी, होज्या शुद्ध आत्मा तेरी। जन्म मरण की छुट कै फेरी, मुक्ति पद की होज्या आस ॥
4. चन्द्रभान सन्त बतलाते, युक्ति कर मार्ग दिखलाते। भ्रगवन से हैं गुरु मिलाते, कर सेवा खा मेवा खास।। सुबह नहीं तो शाम मिलैगा...
भजन-169
( तर्ज:- बहना मतलब का संसार )
टेक : हरि भजन में होज्या लीन बहना जैसे जल में मीन।
1. निराकार साकार वही है, कर्णहार करतार वही है। अद्भुत माया जोत नवीन, बहना जैसे जल में मीन।
2. हरि ओम् की रटले माला, बिगड़ी में बनै आप रुखाला। मन में करले खास यकीन, बहना जैसे जल में मीन।
3. सत्संग के मां निशदिन जाके, हरि कीर्तन मन से गाकै। पांचों ठग हो जां बलहीन, बहना जैसे जल में मींन ।
4. सीता राम का लादे नारा, राधेश्याम का सुने जयकारा। सिर पे पां मत ना भागें तीन, बहना जैसे जल में मीन ।
5. चन्द्रभान कर खास कमाई, सन्तों ने जो विधि बताई। हरि प्रेम का दिखै सीन, बहना जैसे जल में मीन।
भजन-170
( तर्ज:- करो हरि का जाप )
टेक:- नींद नशे ने त्याग, जाग क्यूं सोवै सै ।
टेक:- भजन कीर्तन सत्संग बिन तनैं वृथा जीवन खोया।
1. पिछला वायदा करले पूरा, ध्यान जमाले देख जहूरा। हरि भजन में लाग, जाग क्यूं सोवै सै।
2. झाल डाट ले सारी मन की, फूक बना दे ढेरी तन की। या पांच विषयों की आग, जाग क्यूं सोवै सै ।
3. जिंदगी ओस जिसा है पानी, पल में होज्या खत्म कहानी। डसै काल का नाग, जाग क्यूं सोवै सै।
4. सतगुरु की शरणागत जाके, भजन कीर्तन हर के गाके। मिटजां दिल के दाग, जाग क्यूं सोवै सै।
5. चन्द्रभान ले ज्ञान की शिक्षा, सन्तों की सुनकै ने शिक्षा। तीन ताप जां भाग, जाग क्यूं सोवै सै ।
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