भजन 121
दोहा: - सुख के माथे सिल पड़े, जो नाम हृदय से जाय | बलिहारी वा दुख की, जो पल पल नाम जपाय।
( तर्ज:- सुन्दर तन का के बनता )
टेक:- सब मिल कै मेरे साथ जय-जय कार बोलियों। हो सन्तों की आयु वर्ष हजार बोलियों।।
1. कातिक की पणवासी खुशियां रंग भरी प्यारी। जुग-जुग जियो सन्त मेरे यह विनती हैं म्हारी। होज्या उमर हजारी, सभी नर नार बोलियों॥
2. सनतों की शक्ति का दीपक सदा रहै जलता। इनके दर्शन करने से हर दोष है टलता। इस दर पे सबको मिलता, सच्चा प्यार बोलियो।।
3. सन्त काट दे फंदा अपनी भक्ति के रंग तैं। बिना दवा के रोग करें सैं न्यारे से ढंग तैं। सन्तों के सत्संग तैं, हो उद्धार बोलियो ।।
4. रह हरि की मेहर तो सब पूरे हों अरमान। हजारों दिन जै एक वर्ष के करदे तो भगवान। हो के एक जबान, सभी हर बार बोलियो।।
5. चंद्र्भान संतो के दरशन होते सुखदायी। शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा, ज्यु होती कला सवाई। होज्या आप भलाई, मिलै करतार बोलियो॥
दोहा:- तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चय भजिए राम। जगत मजूरी देत है, क्यों राखे श्री राम।।
भजन-122
( तर्ज:- दर पै सन्तां के जाके )
टेक:- पणवासी के चन्दा ज्यूं हो सनतों की जोत निराली। हे जी ये हर ने भेजे बना दीन दुखी के पाली।।
1. इनके दर्शन करने से ही हो सबकी शुद्ध आत्मा।
रोग सभी छू मन्तर होजां और हो पापों का खात्मा।
जुग-जुग जीओ सन्त महात्मा, है सबकी विपता टाली।।
2. भक्ति से दे के शक्ति ये ज्ञान की जोत जला दें।
दुनिया में खुशबोई फैले एक अद्भुत फूल खिला दे गोबिन्द से कहैं सन्त मिलादें,
झट ला ताले के ताली ।।
3. सौरन जैसी काया होज्या कहै इनका नुस्का खाकै।
पांचों बेईमान कांप जां है इनके दर पै आकै।
पच्चीस रह जां मुंह न बाकै, नहीं लेती कती सम्भाली॥
4. सन्त हरि के जामन हों सैं है इन बिन मिलता हर ना।
परमारथ में लीन रहैं सैं ये अपना करें फिकर ना। सन्त रक्षक हों कुछ भी डर ना;
हैं करते आप रूखाली।
5. चन्द्रभान सन्तों के दर्शन हैं बड़भागी को मिलते।
तीनों ताप खत्म होजां सैं नहीं इनके चक्कर चलते सत्संग से सब दोष हैं टलते,
इसी तेज मे शक्ति ढाली॥
भजन-123
( तर्ज:- सादा )
टेक:- तरुवर सरवर सन्त जन और बादल मेंह - । परमारथ की खातिर चारों देह धार के आवें ।
1. सदी गर्मी तरुवर सारे अपने उपर खेते।
परमारथ करने की खातिर हरदम रहते चेते।
खुद तकलीफ उठाते हैं पर ओरों को सुख देते।
नहीं किसी से भेद भाव ना बदले में कुछ लेते।
फल खाओ चाहे जड़ काटो ना मुंह तैं बोल सुनावैं।।
2. सरवर का हो नेम यही ये सबकी प्यास बुझाना।
चाहे इसमें कोए मिट्टी डालो समझें नहीं बिराना।
मैल खौल ने ओटै हँस के करते ना धिंगताना।
सबकी बेदन मेटैं सारी है इतिहास पुराना ।
परमारथ के कारण सेवा सबकी सही बजावै।।
3. सूर्य की गर्मी से पानी उठ बादल बन जाते।
इतने बोझ नै ठाएं ठाएं कितने चक्कर लाते।
जल से थल भर देते पल में पर हित मेंह बरसाते।
पक और पात सभी हैं अन्न धन भी उपजाते।
औरों के भंडारे भर दें आप नहीं कुछ खानैं ।।
4. सन्त मुनि भगवान रूप दीनों की करूँ सहाई।
ब्रह्म ज्ञानी हो समदर्शी रहैं करते आप भलाई।
पाप रूप का करेँ सफाया सत की करै कमाई।
चंद्र्भान इन सनतों की नही जाती महीमा गाई।
अपनी शक्ति से कर मुक्ति सबके फंद छुटाबैं।।
भजन-124
( तर्ज:- हम आकर शोश झुकाते है। )
टैंकः- ये संकट सब मिट जाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे दर्शन से।
हम सच्चा आनन्द पाते हैं, गुरूदेव तुम्हारे दर्शन से ।।
।. होते हैं शुद्ध ख्याल यहां, और कटते सब जंजाल यहां ।
ये पांचों ठग घबराते हैं, गुरुदेव तुम्हारे दर्शन से ।।
2. तुम दीन दुखी के रखवाले, दो खोल भरम के सब ताले।
हम ज्ञान की जोत जगाते हैं, गुरुदेव तुम्हारे दर्शन से ।।
3. जो शरण तुम्हारी में आए, हैं फल मिल जाते मन चाहे।
नहीं तीनों ताप सताते हैं गुरुदेव तुम्हारे दर्शन से ।।
4. कह चन्द्रभान सखदायक हो, सेवक के आप सहायक हो।
मिलता भगवान बताते हैं गुरुदेव तुम्हारे दर्शन से॥।
भजन-125
( तर्ज:- करलो सोच विचार )
टेक:-मत करियो एतबार माया ठगनी सै।
1. जान बूझ मत फंद में फहना, इस ठगनी से दूर ही रहना।
ये मतलब की यार, माया ठगनी सै ।
2. पच्चीस चित्त चरोवन खातिर, साथी पांच खातिर।
हरदम रखती तैयार, माया ठगनी सै।
3. आशा तृष्णा ममता माया, सबने मिल कै जाल फैलाया।
डोब देवै मझधार, माया ठगनी सै ।
4. अपने लाके जादू झाड़े, मीठी बनकै दीन बिगाड़े।
बहुत करे बेकार, माया ठगनी सै ।
5. जै इस तैं हो ज्यान बचानी, सन्तों की सुन ले ने बाणी।
कर देंगे होशियार, माया ठगनी सै ।
6. चन्द्रभान माया का धन्धा, सन्त काट दे इसका फंदा।
करकै शुद्ध विचार, माया ठगनी सै।
दोहा:- गुरु ही के परताप से, मिटै जीव की व्याध।
रोग दोष दुख ना रहें, उपजै प्रेम अगाध ।।
भजन-126
( तर्ज:- बन्दे कर ले भजन हरि का
1. हाँ ए ले राम नाम ने टेर, अन्धेरा मन का मिट जावे ।
2. . हे सन्तों का सत्संग करके, दोनूं बक्तां राम सुमर कै ।
3. . काम क्रोध मद्य त्यागै सूरती सही हरी मै लागै।
छोड़ सिंहासन इक दम भागै एक पल की ना देरी लावै॥
4. . यह संसार राइन केए सपना, झूठी मेर कोइ ना अपना।
साथी राम नाम का जपना,मुक्ति धाम सही पावै॥
5. चन्द्रभान सन्त का कहना, दूर विषयों से बिल्कुल रहना।
अपनी आँख खोल ले बहना, भूल में धोखा क्यूं खावै।
हां ए ले राम नाम ने टेर... दोहा:- कबीरा ते नर अन्थ हैं, जो गुरु को कहते और।
हरि रुठे गुरु ठौर है, गुरु रुठे नहीं ठौर।
भजन-127
( तर्ज:- मैं राही भटकने वाला हूं )
टेक:- मैं सन्त नाम का मस्ताना, चाहे दुनिया कहे मुझे दीवाना ।
1. वह चन्दा मैं चकोरा हूं, वह फूल कमल मैं भौरा हूं।
वह ज्ञान शमां मैं परवाना, चाहे दुनिया कहे...
2. वहां विपता सारी टलती है, और राही मोक्ष की मिलती है।
है प्रेम सही क्या घबराना, चाहे दुनिया कहे...
3. जो शरण सन्त की जाते हैं, वो नर नारी सुख पाते हैं।
है फल मिलता सब मन माना, चाहे दुनिया कहे...
4. दो कदम वहां पर टेक जरा, एक बर तो जाकै देख जरा।
रह सन्त नाम से खटका ना, चाहे दुनिया कहे|
5. कह चन्द्रभान नहीं डरता हूं, मैं प्रेम से पूजा करता हूँ .
है सन्त नाम पै मिट जाना, चाहे दुनिया कहें-.. मैं सन्त नाम का मस्ताना...
दोहा : यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की नम ।
शीश दिए सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान।।
भजन-128
( तर्ज:- साथन आओ हे सत्संग में )
टेक:- बहना आओ हे, चलैं सन्तां के दरबार।
1. सत्संग हो गुरुआं के दर पै, सच्ची सुरत लगे जहां हर पै।
है राम नाम प्रचार, बहना आओ है...
2 . जो सन्तां के दर ने टोहगी, अपने दाग जिगर के धोगी।
वा होगी मीरां पार, बहना आओ है.
3. सन्तों के करकै ने दर्शन, काया शुद्ध मन होता प्रसन्न।
हों सब दूर विकार, बहना आओ है...
4. दर्शन वहां देते गिरधारी, राधेश्याम की धुनी जो प्यारी।
बोल रहे नर-नार, बहना आओ है...
5. चन्द्रभान लगै देर जरा सी, सन्त काट दें यम की फांसी। हो मुक्ति पद त्यार, बहना आओ है...
दोहा: - भक्त बीज पलटै नहीं, जो जुग जाए अनन्त।
ऊँच नीच घर जन्म ले, तऊ सन्त का सन्त ।।
भजन-129
( तर्ज:- हो जांगे सिद्ध काम राम के रटने तैं )
टेक :- करो हरि का जाप, पाप सब धु जांगे।
।. पांचों को करकै ने वश में, आनन्द ले लो हरि के रस में। मिटजां सारे ताप, पाप सब धू जांगे।
2. सुबह शाम हरि कीर्तन गाकै, राधेश्याम की रटना लाकै। होज्या हिरदा साफ, पाप सब धू जांगे।
3. लगा ध्यान जो पास बुलावै, नहीं देर वो भाज्या आवै। दर्शन दे खुद आप, पाप सब धू जांगे।
4. राम नाम से विपत टलैगी, नहीं ठगनी की दाल गलैगी। ये खुद होजां गर गाप, पाप सब धू जांगे।
5. चन्द्रभान ये सन्त बताते, भगवन तो खुद ही मिल जाते। हो सतगुरु की छाप, पाप सब धू जांगे। करो हरि का जाप...
भजन-130
टेक:- हरे राम चाहे राधेश्याम कहै ध्यान मगन हो टेर लिए।
मन का मनिया ज्ञान डोर चुपचाप या माला फेर लिए।।
1. पांच तत्व का बना पुतला बिना भजन बेकार रहै।
मौत की आंधी टकरा एक दिन बना बनाया महल ढहै।
काम क्रोध मदद लोभ तृष्णा इनके फंद में सहम फहै।
होज्या मुक्ति लाले जुगती क्यूं ना मुख से राम कहै।
लगा समाधि तुरिया पद में रटन का ढाला गेर लिए।।
2. वहां क्या-क्या कहै के आया था यहां गूंगा डे क्यूं मेरा मेरी हेरा फेरी चढ़े तवै तूं भी पोग्या ।
बायदे करके भूला सारे गाफिल होकै क्यूं सोग्या। जै कोए याद दिवावै सै तो नाड़ तले ने क्यूं गोग्या।
ज्ञान की जोत जगा दिल में कर सारा दूर अन्धेर लिए।।
3. दो दिन के मनोरंजन खातिर अपना मन बहलाया क्यूं
देख पराई चोपड़ी है अपना जी ललचाया क्यूं ।
आशा माया ममता में फंस सहम में दुखड़ा ठाया क्यूं ।
राम नाम तैं नफरत थी तो इस दुनिया में आया क्यूं ।
हरि नाम के मोती चुग ला अपने मन में ढेर लिए ।।
4. चन्द्रभान सन्त कहते बस इसमें तेरी भलाई सै।
हे खरी मजूरी चोखे दाम नहीं रहती करी कमाई सै।
आध घड़ी सत्संग में जा तेरे रोग की खास दवाई सै।
मुक्ति पद का धाम मिला जिसने हरि कीर्ति गाई से।
फंद कटज्या आनन्दी छा ला रट्टा शाम सवेर लिए।।
दोहा: - पर द्रोही पर दार रत, पर धन पर अपवाद। ते नर पामर पाप मय, देह धरे मनुजाद।।
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