भजन -41

टेक:- हां ए तेरे जांगे सिद्ध काम, सत्संग के मांह चालिए हे।

1. जड़े हरि कीर्तन गान हो, उड़े खुद हाजिर भगवान हो । हां ए तू लेके गुरु का नाम, अपना ध्यान जमा लिए हे।।

2. सब रोग कटैं संकट मिटैं है, पाप दोष सारे हटैं हे। हां ए तेरे होज्या तुरत आराम, सन्त रसायन खा लिए हे।।

3. श्रद्धा कर दिल साफ हे, तेरे मिटजां सब सन्ताप है। हां ए उड़े चल सन्तां के धाम, दो घड़ी कीर्तन गा लिए है।।

4. रख पक्का विश्वास हे, तनैं मिलज्या पर्जा खास है। हां ए तेरे होजां ठाठ तमाम, जीवन सुखी बना लिए है।।

5. कह चन्द्रभान हो निहाल है, तेरे कटजां सब जंजाल है। हां ए तू पहुँच गरावड़ गाम, मन चाहा फल पा लिए हे।।

वार्ता: गर्जवान दर्दबान आदमी पता नहीं कहां से कहां चला जाता है। बहुत से रोगी और दुखी जन चमत्कारी सन्त आश्रम में आकर लाभ उठाते हैं। हर शनिवार तथा पूर्णमासी को सत्संग में आकर बहुत से प्राणी दुखों से छुट कारा पाते हैं।

भजन-42

( तर्ज:- कृष्ण, घर नन्द के आए )

टैक:- हमें विश्वास भक्ति का दिलाता सन्त का सत्संग। है राही मोक्ष मुक्ति की दिखाता सन्त का सत्संग।।

1. मिटा दे ख्याल सब गन्दा, हरि शरणम्‌ का ले धन्धा। चौरासी लाख का फन्दा, कटाता सन्त का सत्संग॥

2. सन्त का संग है जिसको, मिले बैकुण्ठ है उसको । हरि के नाम के रस को, पिलाता सन्त का सत्संग ॥

3. छूट जाते सभी झंझट, रोग और दोष जां सैं हट। हतरणी पार का परमट, बनाता सन्त का सत्संग ।।

4. चन्द्रभान रटले राम, मिलज्या मुक्ति पद का धाम । रठना राम ही का नाम, सिखाता सन्त क्ा सत्संग।।

दोहा:- नारायण सत्संग कर, सीख भजन की रीत काम क्रोध मद लोभ में, गई उमरिय बीत

भजन-43

(तर्ज:- मेरी जिहवा बोलै राम राम )

टैकः- मेरी रसना बोलै सन्त-सन्त मेरी नस-नस बोलै गुरु -गुरु।

1. बालक था पर नहीं डरा था, गुरु वचन पर ध्यान धरा था। सच्चे मन से याद करा था, पार उतरगे बाल ध्रुव । मेरी रसना बोल...

2. सन्त बतागे सही लीख, न्यूं डाकू ने ली मान ठीक । मरा मरा कह बाल्मीक ने ध्यान जमाना करा शुरु । मेरी रसना बोले...

3. शिबरी राम दर्श की प्यासी, घर पै आगे थे सन्यासी फल मिल गे थे बारामासी, भक्ति का लिया सींच तरु मेरी रसना बोलै...

4. गुरु दया से ज्योति खिल ज्या, बेहतरणी से पार निकलज्या। चन्द्रभान कह टोकन मिलज्या या गाड़ी ज्यागी गेट थरु।

दोहा: - राम नाम जपते रहो जब लगी घट मे प्राण कबहु तो दीन दयाल के भनक पड़ेगी कान

भजन-44

 ( तर्ज:- तेरे पूजन को भगवान )

टेक: (यह सन्तो का अस्थान करें यहां गुरुओं का गुणगान)

1. रोग दोष यहा सारे मिट ज्या लाख चौरसी फंदे कट ज्या। जीवन का होज्या कल्याण, करो यहाँ....

2. बिल्कुल सच्चा धाम यहां है, हरि कीर्तन काम यहां है। यहां खुद हाजिर हो भगवान, करें यहां...

3. गोबिन्द से गुरु मिलाते हैं, ये नैया पार लंघाते हैं । जै अपना सही जमाले ध्यान, करें यहां...

4. सन्त समागम मुश्किल थ्यावै, यदि सन्त से मिलना चाहवै। तो चलिए तज माया अभिमान, करें यहां...

5. सन्त दया जै तुझ पै होज्या, सारे दाग जिगर के धोज्या। फिर होज्या गंगा सा अस्नान, करें यहां...

6. सनतां के जो दर पे आवै, मनचाहा फल सारा पावै। हो इच्छा पूरी चन्द्रभान, करें यहां....  

भजन-45

 ( तर्ज:- बार-बार तोहे क्या समझाऊं )

टेक:- अन्त समय में राम नाम ही काम आवैगा । करले ने अभ्यास फेर नहीं मौका थ्यावैगा॥

1. लाख चौरासी छुटै सींचले राम नाम की बेल । माता पिता बंधु सुत दारा सब मोह माया का खेल। है जीते जी का मैला कोए न साथ जावैगा।।

2. हरि नाम के साबुन तैं ले दाग जिगर के थो। वक्त चूकज्या बात बीत फिर पछताए के हो। काम, क्रोध, मद, लोभथ खो रंग दूना छावैगा ।।

 3. राम नाम की रटना जै होगी अभ्यास की । रोक सके न कोए मिलज्या डिग्री पास की । राही मोक्ष खास की रस्ता साफ पावेगा ।।

4. गुरु ज्ञान की चाबी तैं जा खुल भ्रम का ताला। तन का मिटै अन्धेरा होज्या हिरदे में उजियाला। चन्द्रभान रटो माला हरि दर्श दिखावेगा ।।

दोहा:- गुरु गोबिन्द दोउ एक हैं, दूजा सब आकार। आपा मेटे गुरु भजै, तब पावे करतार।।  

भजन-46

( तर्ज:- आं रै तने के मिल ज्यागा मूर्ख )

टेक:- बन्दे करले भजन हरि का जिंदगी थोड़े से दिन की ।

1. गर्भ बीच के कह कै आया, आकै नहीं वो सारा वायदा तनै भुलाया, याद करी ना भगवान की माया

2. एक दिन तेरे उचाटी होज्या, सब की तबीयत आवै काल या माटी होज्या, भरम भरोटे के तन की

3. दिन का यहां दर्शन मेला उड़ ज्यागा है हंस अकेला साथ चले ना पाई धेला, आस तकै सै जिस धन की।

4. मात पिता बन्धु सुत दारा, जीते जी का भाई चारा। अन्त समय ना कोए प्यारा, ठाड मान रहा सै जिनकी ।

5. चंद्र्भान रटा कर हर नै, मोह माया के छोड़ फिकर नै। सीधा पहुँचे हर के घर ने, संशा मिट ज्यागी मन की ।

दोहा:- सदगुरु चन्दन सम कहा, ईश प्रेम सुवास। निशिदिन दान करे उसे, जो जन आवै पास ।। सच्चे गुरु की शरण में, मन पावै विश्राम। मन मांगा फल तब मिलै, जपै राम को नाम।।  

भजन-47

 ( तर्ज:- मिलता है सच्चा सुख केवल )

टेक:- राम नाम की लूट मची तू ले ने लूट मेरी बहना।

1. सच्ची सुरत तनै लाली, तो हिरदे की मिटज्या काली। राम नाम अमृत प्याली, एक ले ले घूंट मेरी बहना।

2. फुरसत के मां काम मिलै, कोए खर्च नहीं बिन दाम मिलै। तनै मुक्ति पद का धाम मिलै, नहीं रती झूठ मेरी बहना।

3. सै काम नहीं शरमावण का, दो घड़ी कीर्तन भायत का। हरि दर्श के पावण का, यो सीधा रूट मेरी बहना।।

4. थोड़ा सा भी टिकज्या मन तो घाटा नही हो इकट्ठा धन। राम नाम अनमोल रल, तेरी भरज्या मूट मेरि बह्ना।।

5. क्यूं गर्व करै जिन्दगानी का, है जीव बुलबुला ही का। एक दिन रतन जवानी का, जा मटका फूट मेरी बहना।

6. गया वक्त कोन्या थावै, तनै चन्द्रभान न्यूं समझावै । फिर अन्त समय पछतावै, जब जां प्रानी छूट मेरी बहना।।

दोहा:- दर्शन कीजे सन्त का, दिन में कई-कई बार। मास आसोज का मेंह ज्यों, बहुत करे उपकार।।

भजन-48

( तर्ज:- बड़भागी घर होवै )

टेक:- दाग जिगर के धोवे सनतों का सत्संग सन्तों का सत्संग, गुरुवों का सत्संग ।।

1. सत्संग तै शुद्ध होवै आत्मा, सब पापों का होने खात्मा। रोग दोष सब खोवै, सन्तों का सत्संग ।।

2. सन्त करें उद्धार जगत का, रस्ता करदें साफ अगत का। जौ, गंगा में बोवै, सन्तों का सत्संग ।।

3. सन्त समागम हरि की बाणी, दोनूं चीज हों मुश्किल थ्याणी। बड़े कर्म तैं होवै, सनतों का सत्संग।

4. जिन पै दया सन्त की होती, सही ध्यान हो जगज्या ज्योतिं। नींव तार दे चोवै, सनतों का सत्संग ।।

5. चन्द्रभान सनतों का धन्धा, काटें लाख चौरासी फंदा। राही मोक्ष की टोहवै, सनतों का सत्संग ।।

 वार्ता: सदगुरु पूर्ण ब्रह्म सों, विनय करूं कर जोर। तुम बिन जग में है नहीं, मैं देखूं जांकी ओर।

भजन-49

( तर्ज:- निर्बल के प्राण पुकार रहे )

टेक:- सेवक के प्राण पुकार रहे, गुरूदेव हरे गुरुदेव हरे।

1. मेरी रग-रग में गुरु नाम बसै, और आठ पहर सुबह शाम बसै। यही जीवन का आधार रहे, गुरुदेव हरे गुरुदेव हरे।।

2. अद्भुत है तुमरी माया, ये भेद किसे ने ना पाया। सब ऋषि मुनि सिर मार रहे, गुरुदेव हरे गुरुदेव हरे।।

3. गुरु सहारे मिलज्या मुक्ति, फंद कटन की लगज्या जुगती। यह जीवन नैया पार रहे, गुरुदेव हरे गुरुदेव हरे।।

4. कभी साथ सन्त का छूटो ना, गुरुदेव मेरे से रूठो ना। चाहे रूठा सब संसार रहे, गुरुदेव हरे गुरुदेव हरे।।

5. जो गुरु वचन पै सही डटै, कह चन्द्रभान हर दोष मिटै। नहीं किसे चीज की हार रहे, गुरूदेव हरे गुरूदेव हरे।। सेवक के प्राण...

दोहा :- ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । गुरु सेवा तै पाइये, सदगुरु चरण निवास ।।  

दोहा :- गुरु हैं बड़े गोबिन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरे सो बार है, गुरु सुमरे सो पार।।

भजन-50 ( तर्ज:- सादा )

टेक:- दुःख मिटज्या संकट कटज्या जो सन्त शरण में आज्या मी लाख चौरासी फंदा कट वो परम गति को पाज्या सै।।

1. कलियुग में एक सन्त बताए ज्ञान मोक्ष के देवा। नाम जहाज बना के कहैं सैं पार लंघा दे खेवा। सेवा से फल मिलता मेवा न्यूं आनन्द सा छाज्या सै॥

 2. 68 तीर्थ सन्त शरण में शेष महेश गणेश। त्रिवेणी की धार सन्त होते भगवन का भेष। मिटजां सभी क्लेश सन्त की जो महिमा गाज्या सै॥

3. बहतरणी तैं पार होंण की सन्त बतावें कतरी । लोहा भी सोना बनज्या हों सन्त पारस की पथरी। दुख ओटण की छतरी सन्त जी हो सुख में साझा सै।।

4. चन्द्रभान शरण सनतों की अजब निराली माया। जन्म-जन्म के पाप कटैं जो सन्त शरण में आया। निर्मल मन शुड हो क्या वो गंगा में नहा ज्या सै

दोहा: निराकार की आरसी संतन की है देह। लखा जो चाहे अलख को, इसमे भी लख लेह।।