भजन -31

(तर्ज :- सादा चोकलिया)

 टेक: विधा से विद्वान बनै सिध काम पढ़ाई करदे उंची पदवी पावै उज्जवल नाम पढ़ाई करदे

1. विधा ही प्रधान मंत्री, रास्टपति बनादे विधा हि एम एल ए एम पी किश्मत शिखर चधा दे गवर्नर कमांदर बना कै विधा देश पै हुकम चला दे विधा ही कप्तान कर्नल कै कांधै फूल धरा दे विधा जादु से जग मे आराम पढ़ाई करा दे

2. विधा से ही विज्ञान का सब अंदाज लगालेत टेलिफोन तार रेडियो टेलीविजन बना ले विधा से ही टैंक तोप और ह्वाई जहाज चलाले विधा से एटम बम राकेटजग पै रोब जमा ले दुश्मन का भय मिट ज्या रोक और थाम पढ़ाई कर दे

3. बिद्या से भारत के नेता हिन्द आजाद करागे। नेहरू पटेल सुभाष विद्या से नाम जगत में पागे। लाल बाल पाल भगत सिंह गुण विद्या के गागे। विद्या से महात्मा गांधी राष्ट्रपिता कहागे। बापू समझ कै पूजा दुनिया धाम पढ़ाई करदे ।।

4. विद्या ही ने कलवे का नां कालीदास कहाया। विद्या कारण बाल्‍्मीक ने राम चरित्र गाया। जिसने मन ला विद्या पढ़ ली वह जन्म-जन्म सुख पाया। विद्याहीन मनुष्य इस जग में पशु तुल्य बताया। चन्द्रभान तेरा रोशन गरावड़ गाम पढ़ाई करदे।।

वार्ता: जब आपने गांव की पंचायत को विद्या की महिमा बतलाई तो सारे का सारा गांव एक सुत्र में बंध गया और स्कूल के लिए गान्वा वासियों ने श्रद्धानुसार चन्दा दिया और प्रोग्राम बना कर 2। जनबरी 1956 को आपके कर कमलों द्वारा विद्यालय की आधारशिला रखवाई गई। ऐसा कठिन कार्य आपके सिवा किसी साधारण व्यक्ति के वश का नही था

भजन -32

 टेक: कठी हो पंचायत, सुन सब बात, संत की आकै बना दे मिदल स्कूल सुख-दुख ढाकै

1. मिलकै छत्तीस जात, चली एक साथ, ध्यान लगाया। होग्या नया उमंग रंग सा छाया। बना कै ने प्रोग्राम, फिरैं सुबह शाम, मता उपाया। सब ने दे दिया दान मान बढ़ाया। छोड़ के धंधा, करा कट्टा चन्दा, घर-घर के मां जाके ।।

2. श्रद्धा तै भी बाध, करी इंमदाद, सभी ने भाई। खुश होगे नर-नार कार मन चाही । कुछ ना लागी देर, मिटा अन्धेर, हुई रोशनाई। होगा पूरा काम धर्म की राही। हिम्मत का हो राम, बनै सिद्ध काम, हरि गुण गाकै ।।

3. इक्कीस जनवरी का दिन, साल छप्पन, ने बात बणादी। सन्त जी ने खुश हो नींव जचा दी। बनैगा मिडल स्कूल, खिलेंगे फूल, पौध लगा दी। हो घर-घर में चक चान्दन जोत जगा दी। हों बच्चे विद्वान, बनैं गुणवान, यहां शिक्षा पाकै ।।

4. भक्त जी चन्द्रभान, लगा कै ध्यान, काम करा अच्छा। पुण्य की फलती बेल मेल हो सच्चा । भूलैं ना अहसान, करें गुणगान, बच्चा बच्चा । बना पूरा प्रोग्राम काम ना कच्चा । किस्मत चढ़ज्या, बच्चा पढ़ज्या, रूखा-सूखा खाकै ।।

वार्ता: इस्के बाद संत जी गांव के बाहर गुरु समाधी पर रहने लगे वहाँ समाधी का विस्तार किया। लम्बी चौड़ी पालको ठीक स्वर्ग आश्रम का रूप दिया । हर मंगलवार को सत्संग होता था । दूर दूर से जनता सत्संग में शामिल होने के लिए आने लगी यह क्रम एक वर्ष चला। परन्तु कुछ परिस्थितियों के कारन आपको यह आश्रम छोड़ना पड़ा और गांव वालों के आग्रह पर आप पुन: गांव में अपने आश्रम पर आए और इसी प्रकार परोपकार के कार्य आपने किये । यह सारा हाल अगले भजन ही पढ़िये।

भजन-33

(तर्ज:- निर्बल के प्राण पुकार रहे )

टैक:- गुरु समाधि पै जाके फिर अपना ध्यान जमाया था। बालकों ठीक करा करके एक आश्रम सही बनाया था।

1. स्वर्ग में कोन्या रही कसर, वहां दर्श को जां थे नारी नर। मंगलवार को सत्संग कर, यह नियम एक वर्ष पुगाया था।।

2. जा पंचायती ल्याये जब वापिस घर इअर आये तब। रस्ते खैंचे ठीक कराए सब, कर ख्याल जोहड़ खुदवाया था।।

3. गली भी पक्की करवाई, रस्तों पे पुलिया बंधवाई। बजरंग की मुर्ती बनवाई, परोपकार का बीड़ा ठाया था।।

4. मीर्च भभुती बनी दवा, दी प्रेता जूनी दूर भगा। सर्व रोग का नास हुआ, जब माथे हाथ लगाया था।।

5. चंद्र्भान विश्वास करो, कोई आकर आजमाइस करो । चौदह मास तक खयास करो, यह चमत्कार दिखलाया था।।

वार्ता: संत जी ने इस प्रकार के चमत्कार दिखलाए जिसके कारण इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई और मंगलवार को संत्संग मे दूर-दूर से प्रजा आने लगी आपस मे भक्त जन संत के संबन्ध मे इस प्रकार भजन कहने लगे

भजन-34

( सिर पे टोपी लाल )

टेकः- सुनैं सभी नर नार, करें सैं भक्ति का प्रचार, सन्त एक ब्रह्मचारी।

1. प्रेम से कहते राम कहानी, मिश्री तैं भी मीठी बाणी, लागे प्यारी-प्यारी सै। प्यावें ओम नाम का प्याला, पीने वाला हो मतवाला, आनन्दी सी छारी सै। आ रही सै अजब बहार, खोल रहे भक्ति का भंडार, सन्त एक ब्रह्मचारी ।

2. छोड़ो झूठ कपट बेईमाना, किसी जीव को नहीं सताना, हरि भजन से खूब रजो। दया धर्म के बन कै पुजारी, जामनी, जुआ, चोरी जारी, सभी खटाई दूर तजो। भजो निशदिन करतार, कहैं सैं होज्या बेड़ा पार, सन्त एक ब्रह्मचारी ।

3. गऊ माता की टहल बजाओ, साधु सन्त का मान बढ़ाओ, ये कर देते मन का चाहा, चिड़िया कैसा रैन बसेरा, एक दिन हो जंगल में डेरा, मूर्ख क्यों है गर्भाया| मोह माया का संसार, बतावैं डटना सै दिन चार, सन्त एक ब्रह्मचारी,

4. चन्द्रभान गुण हर के गाले, अपना जीवन सफल बनाले, गया वक्त कोन्या थ्यावै। क्यूं ना ओम नाम रस घूंटै, आवागमन तै पैंडा छ्टै, मोक्ष पदी पद ने पावै। नहीं पछतावै सिर मार, बतावें मुक्ति का आधार, सन्त एक ब्रह्मचारी।॥।

भजन-35

( तर्ज' - तेरे पूजन को भगवान है)

टेक:- बन्दे दो दिन का मेहमान, मत हो माया में गलतान। मत हो माया मे गलतान

1. मात पिता बन्धु सुतदारा, सगे अशनाई और भाई चारा। हो प्यारा जीते जी का जहान.......

2. गर्भ बीच मे जो कह कर आया, आके नहि वो प्रण निभाया कोन्या लाया हर मे ध्यान....

3. काट लिये जिसे यहाँ पर बो ज्या, भक्ति दाग जिगर के धो ज्या मंजिल हो ज्या तेरि आसान.....

4. काल का फंदा घलज्या गल में, ज्यान तेरी फंस ज्या मुश्किल में । होजां पल में खत्म प्राण....

5. चन्द्रभान हरिनाम सुमर ले, भवसागर तैं पार उतर ले। करले जीवन का कल्याण......

बार्ता:- अपनी योग सिद्धि के कारण सन्त जी ने गूंगे को जबान, अन्धे को आँख और बहरे को कान दिए । इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि जो आदमी जैसी श्रद्धा से आश्रम पर आया, उसे वैसा ही फल मिला । बिना औषधि के सर्वरोग नाश करना, भूत-प्रेत ओपरा पराया रोग केवल काली मिर्च और भभूती से दूर करना सन्त जी का काम रहा । यह चमत्कार नहीं तो और क्या है। अतः: हम दूसरे शब्दों में इनके चमत्कारों को देखकर ' चमत्कारी सन्त' के सिवा किस उपाधि से याद कर सकते हैं । राम समारै काम किसे के मांह के हो सकता है, भगवान ने इनके हाथ जस दिया हो ।

भजन-36

( तर्ज:- सादा )

टेक:- श्रद्धा शक्ति से सन्त ने सच्ची जोत जगा दी। चमत्कार की चुटकी तै जनता की चौंध हटा दी ।।

1. गूंगे को दी जीभ सन्त ने बोलन लाग्या बाणी । बहरे के दिये कान खोल जो सुनता राम कहानी । अन्धे ने सब चीज पिछानी, बिन औषध आँख खुलादी ।।

2. भूत प्रेत का करा खात्मा माथे हाथ लगाकै। ओपरा पराया दूर करया पढ़ी काली मिर्च खुवा के । एकली भभुत चटा के तन की चिन्ता सभी मिटा दी ।।

3. जिसकी जैसी श्रद्धा हो वह वैसा ही फल पाज्या। है सब रोगों का नाश होवै जै एक बर दर पै आज्या। कट के फन्द आनन्दी छाज्या, बिगड़ी बात बना दी।।

4. प्रत्यक्ष को प्रमाण नहीं कोए आकर देखो चटका। हाथ कंगन को आरसी क्या ना एक मिनट का अटका। विश्वास करो मिटज्या खटका, जै सुरती सही लगा दी।।

5. दूर-दूर तैं मानस आकै रोग कटाते देखे। कह चन्द्रभान जो रोते आए वह हँसते जाते देखे। गुण सन्त के गाते देखे, सच्ची कथा सुना दी।।

भजन-37

( वार्तालाप एक सखी का दूसरी सखी से )

तर्ज : शब्दावली टेक: मनै राम भजन मन भावै हे सखी सत्संग की महीमा न्यारी

1. गुरु ब्रह्म के ज्ञाता हो सै, ज्ञान गुण के दाता हो सैं। मन चाहा वर पावै हे सखी, रिधि सिधि मिल ज्या सारी।।

2. संत सत्संग मे हो शुद आत्मा, भूत प्रेत का करै खात्मा। तन का ताप भगावै हे सखी, दिल मे आनंद हो भारी।।

3. सन्त चालीसा गाएं जा जो, नित का नियम पुगाएं जा जो।। रोग सभी कट जावैं हे सखी, दूर हटैं सब बेमारी ।।

4. चन्द्रभान गुण हर के गाकै, दो घड़ी सत्संग में जाकै । मोक्ष पदी पद पावे हे सखी, टेर सुनैंगे गिरधारी ।।

भजन-38

 ( तर्ज:- न्यूं रो रो रूके दे रही। )

टेक:- जिला रोहतक गरावड़ गाम में, हां गाम में, एक रहता सन्त निराला।

1. माता बूली देवी पिता नेकी राम जिसका सै। साल पछतर पणवासी कातिक में जन्म इसका सै । पांच वर्ष की उमर के मां लगा भक्ति का चस्का सै । पिता स्वर्गवास सेवा माता की ही करता था। राम नाम के दाने गेर मटका ठाढ़ा ,भरता था। खेलण खाण की इच्छा कोन्या ध्यान हरि का धरता था। रहै लग्न राम के नाम में, हां नाम में, जब तैं ए होश सम्भाला।।

2. इतनी हकीकत चन्दू लाल ने दादा जी को बतलाईं। ब्रह्मचारी भी खुश होगे बात बनगी मन चाही । कुछ पिछला संजोग सोच दिल में होगी रोशनाई। घर पै जाकै बाल भक्त को गुरु ने आशीर्वाद दिया। बाल भक्त ने प्रफुह्लित हो कै चरणामृत लिया। शिक्षा-दीक्षा दी गुरु ने भक्ति के मां पास किया। ले जा के अपने धाम मे, हाँ धाम मे, भक्ति थप्पे मे ढाला।।

3. साल सतानवें गुरु जी की स्वर्ग लोक को होगी त्यारी कै श कि एक साल करी घोर तपस्या घर पे आगे थे ब्रहाचारी। घास पुबाड़ उबाल खाई एक वर्ष रहे मौनधारी। चान्दरायण ब्रत तो कई कई बार किए। अन्न का भोरा तक ना चाखा राम नाम सत्‌ तै जिए। नवद्या भक्ति देख खुश हो कृष्ण जी ने दर्शन दिए। जब सूरत लगी घनश्याम में, घनश्याम में, आ पहुँचा बंसी आला।।

4. फिर ऋषि समाधि पै जा बैठे नया एक रंग किया। पाल को एक सार करा जनता में उमंग किया। एक साल तक मंगलवार को नियम से सत्संग किया। फिर पंचायत के कहने से वापिस घर पर आए थे। परोपकार करा सब रस्ते खेंचे ठीक कराए थे। गाल पक्की करवाई और जोहड़ भी खुदवाए थे। कहैं सन्त जी नगर तमाम में, हा तमाम में, चाहे बूढ़ा हो चाहे बाला।।

5. गाम का करा कै मेल बात मेटी भूल की। जनता मे खुश्बू फैला दी शिक्षा के फूल की। ईक्कीस जनवरी सन 56 मे नीव धरी स्कूल की। जीन आलै पै बजरंग बली कि मुर्ति का वास किया। परोपकार के काम मे, हा काम मे, नही किसे वक्त भी टाला।।

6. चन्द्रभान गरावड़ का कह देख लियो चाहे अजमाकै। खुला है दरबार सन्त का दर्शन करो कभी आकै। रोहतक से बस सर्विस मिलती चार टेम पर आ जाकै। दर्शन से प्रसत्रता मिलज्या सब तरियां आनन्द हो। भक्ति का प्रकाश देख दूर मन का गन्द हो। ऋद्धि-सिद्धि सेवा से मिलती चाहे मति मन्द हो। वह मस्त हरि के जाम में, हां जाम में, दिन रात रटें जा माला ।।

भजन-39

( तर्ज:- सादा )

 ( सन्त के चमत्कार के उदाहरण )

टेक :- भगतां के बस कहा करें भगवान होज्या सै। तदबीर से तकदीर बनै कल्याण होज्या सै।।

1. सन्त समागम हरि कथा कहैं तुलसी दुर्लभ दो। सुत दारा अरु लक्ष्मी तो घर पापी के भी हो। मंत्र डॉक्टर ज्योतिषी में भावना रखै जो । गुरु में जैसी श्रद्धा हो सै फल वैसा ही लो। सन्त दया से हर मुश्किल आसान होज्या सै।।

2. गाम रामगढ़ का लड़का था नाम दलेल सिंह। अठारा मानस साथ गात का हो रहा था लेढ़ंग । भूत प्रेत छलावा कोए छिड़ रहा था ऊत मलंग । फिरी सन्त की मेहर गात में डा नया उमंग। फंद कत ज्या दूख मिट कै सुख मे ज्यान हो ज्या सै।।

3. सिठाल गाम की लड़की कृष्णा दुखां को खाईं। कै कदे बन्धे हाथ के नाला घलज्या आँखां में स्याही। एक लड़की खाती की में बोलै थी देबी माईं। दस बारह मानस पकड़े ना काबू में आई। यहां सैयद देबी लिकड़ ठिकाने ध्यान होज्या सै।।

4. सन्त काट दे पल में दुख विपत्ता के फंदे ने। जै सही भावना रखे तजै विचार गन्दे ने। एक फिरै लुगाई दुखी बावली छोड़ धन्धे ने । सन्त शरण में आगी लेके बच्चे अन्धे ने। सब चीज पिछानै बच्चा माँ हैरान होज्या सै ।।

5. नान्दल का कन्डैक्टर भक्त सिंह नाम बतलाया। मधुबन के धोरे गिरीदेव की फेट में आया। नौकरी छूट गी पागल होग्या कुनबा घबराया संत चुतकी तै पल मे होगी तारण सी काया दुख का हुअ सफाया खुशी जवान हो ज्या सै

6. गाव् रिंधाने की औरत कै हो रही थी फतकार। बाला जी तक हो आई कर खर्चा कई हज़ार प्रकाश पति उसका हर तरिया हो रहा था लाचार। बारा बानी की होगी आ संता के दरबार। राम समारै काम मौज के महान हो ज्या सै।।

7. अजायब गाम मांगे की छोरी हो रही बिल्कुल लाश। खान पीन ओढ़न पहरन की कोन्या मन में ख्यास। फूली नाम लड़की का कहते ना जीवन की आस। कटी बीमारी हुई ठीक थी आ सन्तां के पास। साबुन आगे मैल कहैं तूफान होज्या सै ।।

8. भऊ गाम की छोरी हुचकी लागें भारी थी। बाप कर्ण सिंह ने हो रही बिल्कुल लाचारी थी । गाम गरावड़ की मन में जब सुरती धारी थी। करी सन्त ने ठीक गात में बुरी बीमारी थी। चन्द्रभान न्यूं सन्तां का गुणगान होज्या सै।।

वार्ता:- ऐसे चमत्कारों को देखकर सन्त जी के प्रति प्रमियों में ज्यादा श्रद्धा हो जाती है। दो सत्संग प्रेमी इसी प्रकार आपस में बातें कर रहे हैं।  

भजन-40

( तर्ज:- जो गुरु वचन पै डटगे )

 टैक:- दर्शन परम सन्त के करकै, आनन्द हो ज्यागी काया।

1. दर्शन तैं शुद्ध बनै आत्मा, रोग दोष का होने खात्मा। सच्चा ध्यान गुरु का धर कै, फल मिल ज्यागा मन चाहा ।।

2. सन्तां की हो महिमा न्यारी, सेवक के हों सैं हितकारी । मगन रहै हरि नाम सुमर कै अन्त किसे नै ना पाया।।

3. संता का लें कै ने शरणा, बहतरणी से पार उतरणा। लेज्या बाजी लौट पसर कै, गुरुओ की छत्र छाया

4. दुनिया है एक गोरख धन्धा, सन्त काट दे गल का फंदा। बैठ दुविधा के मां घिर कै, मूर्ख दुखड़ा क्यूं ठाया।।

5. जिसके होजां सन्त हिमाती, ऋद्धधि सिद्धि मुक्ति मिल जाती। कदे कदाऊ भूल बिसर कै, जै गुण सनतां का जा गाया।।

6. चन्द्रभान कर ख्याल अगत का, झूठा मोह दे छोड़ जगत का। एक दिन जाना हो ईश्वर के, साथ नहीं जा धन माया।।

 वार्ता:- एक रोगी को किसी डॉक्टर या वैद्य की दवाई से आराम हो जाता है तो वह दूसरों को भी, जो उस रोग से पीड़ित हों, उसी डॉक्टर या वैद्य की दवाई लेने की सलाह देता है। ठीक इसी प्रकार सन्त जी की कृपा से कोई रोगी बहन ठीक होकर अपने घर जा रही थी। रास्ते मे रोग से पीड़ित कोई बहन उसे मिल जाती है। तो वह उसे भीं वह वही सलाह देती जिससे वह ठीक हुई थी